जब सुकून भी बिकने लगे

डाँ नीलम महेंद्र

सभ्यताएँ केवल अपने आविष्कारों से महान नहीं बनतीं, अपितु वे अपनी प्राथमिकताओं से इतिहास में याद रखी जाती हैं। हमारी सभ्यता ने अंतरिक्ष तक पहुँचने की क्षमता विकसित कर ली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर लिया, सूचनाओं को प्रकाश की गति से भी तेज़ गति से दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचा दिया,लेकिन इसी सभ्यता का मनुष्य आज रात भर चैन की नींद सोने के लिए संघर्ष कर रहा है। उसके पास सुविधा है, साधन हैं, संसाधन हैं, पर सुकून नहीं है। और शायद हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि अब सुकून भी एक उत्पाद बन चुका है।

अच्छी नींद के लिए स्लीप क्लिनिक हैं, तनाव से मुक्ति के लिए माइंडफुलनेस प्रोग्राम हैं, जंगल में समय बिताने के लिए फॉरेस्ट बाथिंग है, तारों को निहारने के लिए स्टार बाथिंग है और मोबाइल से दूर रहने के लिए डिजिटल डिटॉक्स रिट्रीट। इनमें से किसी उपाय पर आपत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इनके लाभ वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं। प्रश्न केवल इतना है कि जिन अनुभवों पर कभी किसी का स्वामित्व नहीं था, वे आज पैकेज और प्रीमियम सेवाओं में क्यों बदल गए? क्या हमने जीवन इतना कृत्रिम बना लिया है कि अब अपनी सबसे स्वाभाविक ज़रूरतों तक पहुँचने के लिए भी बाज़ार की मध्यस्थता आवश्यक हो गई है?

दरअसल हाल ही में तीन समाचार लगभग एक साथ चर्चा में रहे। देश के गृह मंत्री ने सार्वजनिक रूप से बताया कि अपनी जीवनशैली में बदलाव कर उन्होंने मधुमेह पर विजय प्राप्त कर ली है। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने इंसुलिन एवं अन्य किसी भी प्रकार की एलोपैथिक दवा से भी मुक्ति पा ली है। इसी प्रकार जर्नल ऑफ एन्वायरमेंटल साइकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में यह पाया गया कि रात में आकाश को निहारने का मानसिक स्वास्थ्य और खुशी के बीच सकारात्मक संबंध है। तो अब वेलनेस थेरेपी के अंतर्गत  ‘स्टार बाथिंग’ (रात में खुले आकाश के नीचे लेट कर तारों को निहारना) मानसिक स्वास्थ्य की चिकित्सा का रूप ले चुका है। इसी प्रकार एक अन्य रिपोर्ट में न्यूरोलॉजिस्टों ने चेतावनी दी है कि देर रात तक मोबाइल स्क्रीन देखने की आदत के कारण युवाओं से लेकर छोटे बच्चों तक में माइग्रेन और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के लक्षण किसी दवा से नहीं बल्कि स्क्रीन टाइम कम करने, रात को समय पर सोने, पर्याप्त नींद लेने जैसे साधारण उपायों से ठीक हो रहे हैं।

देखने में ये तीनों समाचार अलग-अलग हैं, लेकिन इनके भीतर एक ही संदेश छिपा है,मनुष्य अपनी प्राकृतिक जीवन-लय से दूर होता जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में होने वाली लगभग 74 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार भारत में दस करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जबकि तेरह करोड़ से अधिक लोग प्रीडायबिटीज की स्थिति में हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद भी मानती है कि अनियमित दिनचर्या, तनाव, शारीरिक निष्क्रियता और असंतुलित भोजन इस संकट के प्रमुख कारण हैं। इसे क्या कहा जाए कि एक ओर चिकित्सा विज्ञान लगातार प्रगति कर रहा है, तो दूसरी ओर जीवन की स्वाभाविक लय लगातार टूट रही है।

दरअसल समस्या केवल बीमारी नहीं है। समस्या यह है कि हमने सुविधा को ही विकास मान लिया है। हमने समय बचाने वाली मशीनें बनाईं, लेकिन अपने लिए समय नहीं बचा पाए। हमने श्रम कम किया, पर शरीर की सक्रियता छीन ली। हमने संचार के असंख्य साधन बना लिए, लेकिन संवाद खो दिया। हमने घरों को बड़ा बनाया, पर आँगन छोटे कर दिए। हम स्क्रीन के पहले कभी इतने जुड़े हुए नहीं थे और शायद भीतर से कभी इतने अकेले भी नहीं थे।

विकास की इस यात्रा में हमने बहुत कुछ पाया, लेकिन शायद उससे अधिक कुछ खो भी दिया।

आधुनिक उपभोक्तावादी व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह वस्तुएँ बेचती है, उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह जीवन के सामान्य अनुभवों को भी असाधारण बना देती है। जिस आकाश के नीचे कभी बच्चे ध्रुव तारा पहचानते थे, आज वही ‘स्टार बाथिंग’ है। जिस जंगल को भारतीय परंपरा ने तप और आत्मचिंतन का स्थान माना, वही आज वेलनेस अनुभव बन गया है। नतीजन वस्तुएँ नई नहीं हैं, उन्हें देखने का हमारा दृष्टिकोण बदल गया है।

आधुनिक उपभोक्तावाद की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसने हमारी सबसे सामान्य आवश्यकताओं को भी विशेष अनुभव में बदल दिया। पहले स्वास्थ्य जीवन का परिणाम था, आज वह जीवन का प्रोजेक्ट बन गया है। पहले अनुशासन परिवार और परिवेश सिखाते थे, आज उसके लिए अलग से कोच, ऐप और कार्यक्रम उपलब्ध हैं। पहले सुबह की सैर किसी लक्ष्य का हिस्सा नहीं होती थी,वह दिनचर्या थी। आज वही कदम स्मार्ट वॉच गिनती है और उनकी संख्या हमारी उपलब्धि बन जाती है।

कुछ दशक पहले तक गर्मियों की रातें आँगन और छतों पर बीतती थीं। बच्चे दादी-नानी से सप्तऋषि, ध्रुव तारे और चंद्रमा की कहानियाँ सुनते हुए सो जाते थे। गाँवों में किसान खुले आकाश के नीचे रात गुज़ारते थे। तब यह कोई ‘वेलनेस एक्टिविटी’ नहीं थी, बल्कि जीवन की स्वाभाविक लय थी। आज वही अनुभव अंग्रेज़ी नाम, विशेषज्ञों की सलाह और पैकेजिंग के साथ लौट रहा है। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का बाज़ारीकरण है।

यही स्थिति भोजन, योग और ध्यान की भी है। सादा भोजन अब ‘डिटॉक्स डाइट’ कहलाता है। उपवास ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ बन गया है। मौन ‘माइंडफुलनेस’ है और योग अनेक स्थानों पर आत्मानुशासन से अधिक फिटनेस उद्योग का हिस्सा बन गया है। इन परिवर्तनों से लाभ मिल सकता है, लेकिन वे एक असुविधाजनक प्रश्न भी छोड़ जाते हैं,क्या हम अपनी परंपराओं को तब तक नहीं पहचानते जब तक वे विदेशी शब्दावली और आकर्षक पैकेजिंग में हमारे सामने वापस न आएँ?

भारतीय चिकित्सा परंपरा आयुर्वेदि का मूल सिद्धांत है,”स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्”, अर्थात् चिकित्सा का पहला उद्देश्य रोगी का उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा है।

आज जब चिकित्सा और अस्पताल भी एक उद्योग बन चुके हैं, हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वास्थ्य का पहला आधार दवा नहीं, बल्कि जीवन जीने का ढंग है। क्योंकि डॉक्टर उपचार दे सकता है, पर समय पर सोना, संतुलित भोजन करना, नियमित चलना और मानसिक संतुलन बनाए रखना अंततः व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है।

इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक चिकित्सा, तकनीक या वेलनेस सेवाएँ अनावश्यक हैं। उन्होंने लाखों लोगों का जीवन बेहतर बनाया है। प्रश्न उनका अस्तित्व नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं का है। यदि समाज पहले ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित करे जिनमें तनाव, निष्क्रियता और अकेलापन सामान्य हो जाएँ, और फिर उन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए उद्योग खड़े करे, तो हमें केवल उपचार पर नहीं, कारणों पर भी विचार करना होगा।

यही कारण है कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता नए वेलनेस ट्रेंड की नहीं, बल्कि जीवन की खोई हुई लय को पुनः स्थापित करने की है। स्वास्थ्य कोई ऐसा लक्ष्य नहीं जिसे सप्ताहांत में हासिल किया जाए, वह हर दिन जी जाने वाली छोटी-छोटी आदतों का संचय है। सुबह की धूप, थोड़ी-सी पैदल चाल, परिवार के साथ बैठकर खाया गया भोजन, पर्याप्त नींद, सीमित स्क्रीन समय और प्रकृति से नियमित संपर्क,इनका कोई विकल्प नहीं हो सकता।

सभ्यता की वास्तविक परीक्षा उसकी ऊँची इमारतों या तेज़ इंटरनेट से नहीं होगी। उसका मूल्यांकन इस बात से होगा कि उसने मनुष्य को कितना संतुलित, स्वस्थ और भीतर से शांत बनाया। यदि विकास का परिणाम यह हो कि बच्चों को खेलने के लिए कृत्रिम पार्क, बड़ों को चलने के लिए ट्रेडमिल, नींद के लिए क्लिनिक और शांति के लिए रिट्रीट खोजने पड़ें, तो हमें विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार करना ही होगा।

शायद आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास भी न करें कि एक समय ऐसा था जब लोग बिना किसी ऐप के अपनी नींद पूरी कर लेते थे, बिना किसी स्मार्ट वॉच के प्रतिदिन कई किलोमीटर चल लेते थे, बिना किसी ‘स्टार बाथिंग’ पैकेज के तारों को निहारते थे और बिना किसी वेलनेस सदस्यता के भीतर से शांत भी रहते थे। यदि वह समय उन्हें किसी लोककथा जैसा लगे, तो समझ लीजिए कि हमने केवल जीवन की शैली नहीं बदली, जीवन का अर्थ बदल दिया है।

डॉ नीलम महेंद्र

(लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं)

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