वैचारिकी – असहमति के गर्भ से गढ़ा असत्य

  *निजी रूप से मेरा सोनम वांगचुंग, किसान आंदोलन या अन्य किसी आंदोलन/राजनीति से सीधा वास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि मैं एक भारतीय नागरिक हूँ और नागरिक हित की हर आवाज को अपने भीतर महसूस करता हूँ ।*
       *नहीं जानता कि वर्तमान वांगचुंग आंदोलन का सत्य क्या है..? पूर्ववर्ती अनुभवों के खट्टे अनुभव भी मेरी सोच की राह में नहीं खड़े हैं। सच, झूठ,अटकले अफवाहों से इतर मैं  बस इतना देख पा रहा हूँ कि आंदोलन गांधी के रास्तों का अनुकरण करते  हुए अपनी आवाज उठा रहा है। आवाज से सहमति- असहमति हो सकती है लेकिन आवाज उठाना जिंदा होने की गवाही दे रहा है। निर्भय होकर अपनी बात कहने का साहस दिखा रहा है।*
         *यह भी देखने में आ रहा है कि आंदोलन के विरोध में सोशल मीडिया -दुष्प्रचार, कुतर्क, सवाल आदि इस तरह बिखरे हैं मानों  रास्ते को दुर्गम बनाने के लिए उसपर नुकीले कांच के टुकड़े बिछा दिए गए हों। कहने की जरूरत नहीं कि इसमें वही लोग शामिल है जिनका अहिंसा, अनशन, लोकतांत्रिक मूल्य और नागरिक अधिकारों में कोई यकीन नहीं है।*
       *मुझसे ऐसे अनेक सवाल रोज सीधे टकराते हैं। आप आंदोलनों के पक्ष में क्यों लिखते हैं..? आप सरकार के साथ क्यों नहीं हैं..? क्या सरकार हमेशा गलत ही होती है..? आप कांग्रेसी हैं..? वामपंथी हैं..? आदि आदि।*
     *यह सच है  कि हर सवाल का जवाब ना तो जरूरी है और ना ही वह इस तरह के प्रश्नकर्ता को संतुष्ट कर सकता है क्योंकि देश में इन सवालों का मूल  दुराग्रह दशकों- दशक निर्मित हुआ है। ऐसे सवाल सवाल देश की अवधारणा को स्थूल अर्थों में समझते हैं। देश की आजादी को धर्म के भीतर खोजते हैं। गांधी के रास्तों को अराजकता मानते हैं। ये सवाल सही जवाब देने वाले आईनों तो तोड़ देने में अपना शौर्य खोजते हैं।*
       *अभी कल एक ऐसा अजीब सा सवाल मुझसे टकराया कि गांधी जी ने भी भगत सिंह को नहीं बचाया तो सरकार बांगचुंग को क्यों बचाएं ?*
       *प्रथम दृष्टया तुलना बेमानी है, क्योंकि ना तो गांधी जी ने वायसराय थे, ना प्रधानमंत्री और ना ही जज (वे तो तो स्वयं ब्रितानी सरकार के खिलाफ आंदोलनरत थे) और ना ही सोनम वांगचुंग भगत सिंह है, ना क्रांति और ना ही नया  विचार।*
     *चूंकि यह नैरेटिव उस विचार धारा द्वारा देश की शिराओं में रोपा गया है जो गांधी और भगत सिंह दोनों की प्रबल शत्रु रही है। इतिहास जाने बगैर शोर के सहारे असत्य गढ़ती रही है।*
       *यद्यपि इस संदर्भ में तमाम ऐतिहासिक तथ्य मौजूद है कि गांधी जी ने तात्कालिक वायसराय इरविन को भगत सिंह फाँसी की सजा माफ़ के लिए अलग-अलग (18 फरवरी और 23 मार्च 1931) पत्र लिखे थे, जिन पर ब्रिटिश सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया।  गांधी और भगत सिंह का  रास्ते अलग थे लेकिन मंजिल एक (आजादी ) थी। एक दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह था।*
      *ज्ञातव्य है कि गांधी -इरविन पैक्ट में उन आंदोलनकारियों के विषय में प्रावधान था जिन्होंने अहिंसक रास्ता अपनाया था। हिंसा या हत्या के लिए हर सरकार के अपने कानून होते हैं  तदनुरूप सजायें भी। आंदोलनकारी परिणाम जानते हुए अपना रास्ता अपनाते हैं।* (यह सब मेरी किताब गांधी जिंदा हैं’ में है)*
         अंत में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में वांगचुक की तरह अहिंसक आंदोलन करना हर देशवासी का   अधिकार होना चाहिए और चुनी हुई सरकार को वह आवाज सुननी चाहिए।  *समस्त अप्रिय संभावनाओं के वाबजूद आवाजों के समर्थन में आवाज की जरूरत हमारे लोकतांत्रिक धरोहर को जिंदा रखती है।*
 *रास बिहारी गौड़*

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