“नेतृत्व आदेश देने से नहीं, साथ लेकर चलने से सिद्ध होता है” : कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल के कार्यकाल का प्रथम वर्ष पूर्ण होने पर धन्यवाद समारोह आयोजित
अजमेर, 22 जुलाई। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल के सफल नेतृत्व का एक वर्ष पूर्ण होने पर सामान्य प्रशासन अनुभाग द्वारा विश्वविद्यालय परिवार की ओर से भव्य धन्यवाद समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अधिष्ठाताओं, विभागाध्यक्षों, अधिकारियों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर कुलगुरु के नेतृत्व में विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त उपलब्धियों पर प्रसन्नता व्यक्त की।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. सुभाष चन्द्र ने बीते एक वर्ष में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन, शोध, नवाचार, विद्यार्थी कल्याण, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों तथा रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों सहित विश्वविद्यालय की प्रमुख उपलब्धियों का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
इसके पश्चात सामान्य प्रशासन अनुभाग के सहायक कुलसचिव डॉ. सूरज मल राव ने विश्वविद्यालय में हुए अधोसंरचनात्मक विकास, सीएसआर के माध्यम से किए गए निर्माण एवं नवीनीकरण कार्यों, वित्तीय अनुशासन तथा संसाधनों के प्रभावी उपयोग का उल्लेख करते हुए इसे दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम बताया।
अपने उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने समारोह को व्यक्तिगत सम्मान न मानते हुए सम्पूर्ण विश्वविद्यालय परिवार की सामूहिक कर्मनिष्ठा का उत्सव बताया। उन्होंने कहा कि एक वर्ष की सभी उपलब्धियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रत्येक शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी एवं विद्यार्थी के समर्पण, अनुशासन और टीम भावना का परिणाम हैं। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास सदैव “बॉस” नहीं बल्कि “लीडर” बनने का रहा है। “बॉस कहता है—यह कार्य करो, जबकि लीडर कहता है—आइए, हम सब मिलकर यह कार्य करते हैं।” इसी सोच ने विश्वविद्यालय में सहभागिता, संवाद और विश्वास का वातावरण तैयार किया, जिसके कारण अनेक वर्षों से लंबित कार्य भी गति पकड़ सके।
कुलगुरु ने कहा कि उनकी कार्यशैली का मूल मंत्र “विकास भी, विरासत भी” रहा है। आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार, तकनीकी उन्नयन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परम्परा, सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक चेतना को विश्वविद्यालय की कार्यसंस्कृति का अभिन्न अंग बनाया गया है। उन्होंने कहा कि कोई भी विश्वविद्यालय तभी उत्कृष्ट बन सकता है जब वह आधुनिकता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों—दोनों के साथ संतुलित रूप से आगे बढ़े।
उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय का दायित्व केवल परीक्षाएँ आयोजित करना या डिग्रियाँ प्रदान करना नहीं, बल्कि नवीन ज्ञान का सृजन, ज्ञान का समाज तक प्रसार तथा उसके व्यवहारिक अनुप्रयोग को सुनिश्चित करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी रटने की संस्कृति से आगे बढ़कर Knowledge Creation और Application of Knowledge पर बल देती है। इसी दिशा में विश्वविद्यालय को अग्रणी बनाना उनकी प्राथमिकता है। प्रो. अग्रवाल ने घोषणा की कि आगामी स्थापना दिवस को “आत्मनिरीक्षण दिवस” के रूप में मनाने की पहल की जाएगी। प्रत्येक विभाग, प्रत्येक शिक्षक एवं कर्मचारी अपने वार्षिक कार्यों का स्वमूल्यांकन करेगा, आगामी लक्ष्य निर्धारित करेगा तथा विश्वविद्यालय के विकास के लिए अपने सुझाव देगा। उनके अनुसार उत्कृष्ट संस्थानों की पहचान निरंतर आत्ममूल्यांकन और सुधार की संस्कृति से होती है।
उन्होंने विश्वविद्यालय की भावी योजनाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि शीघ्र ही अत्याधुनिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सेंटर तथा एमडीएसयू पॉडकास्ट प्रारम्भ किया जाएगा, जिसके माध्यम से विश्वविद्यालय के श्रेष्ठ व्याख्यान, शोध, नवाचार और अकादमिक विमर्श देश-विदेश तक पहुँचाए जाएंगे। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय के ज्ञान संसाधनों को वैश्विक मंच देने की महत्वपूर्ण पहल बताया। कुलगुरु ने विश्वविद्यालय परिवार का आह्वान करते हुए कहा कि “मेरा विश्वविद्यालय, मेरी जिम्मेदारी” केवल एक अभियान नहीं, बल्कि कार्यसंस्कृति का आधार बनना चाहिए। प्रत्येक शिक्षक, अधिकारी और कर्मचारी यदि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के साथ पहल करेगा तो विश्वविद्यालय राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन, गुणवत्तापूर्ण शोध, नकलमुक्त परीक्षा प्रणाली, समयबद्ध शैक्षणिक सत्र तथा विद्यार्थी-केंद्रित प्रशासन विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्राथमिकताएँ बनी रहेंगी।
वित्त नियंत्रक एवं कुलसचिव नेहा शर्मा ने कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि उनका दृढ़, अनुशासित एवं परिणामोन्मुख नेतृत्व विश्वविद्यालय को नई गति प्रदान कर रहा है। उन्होंने कहा कि वित्तीय नियमों के प्रति कुलगुरु की प्रतिबद्धता, पारदर्शी कार्यप्रणाली तथा संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन के कारण विश्वविद्यालय में विकास कार्यों को नई दिशा मिली है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कुलगुरु के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय आगामी वर्षों में भी उत्कृष्टता के नए आयाम स्थापित करेगा तथा विश्वविद्यालय परिवार स्वयं को ऐसे दूरदर्शी नेतृत्व के साथ कार्य करने के लिए गौरवान्वित महसूस करता है।