रामायण काल का इतिहास केवल अयोध्या और लंका के बीच का नहीं था, बल्कि उसमें कई अन्य संस्कृतियाँ और वंश भी शामिल थे। लंकापति रावण जहाँ अपनी शक्ति से पूरे आर्यावर्त पर प्रभाव जमा रहा था, वहीं सुदूर दक्षिण के द्वीपों पर कालकेय दानव वंश का शासन था। इसी वंश का एक अत्यंत प्रभावशाली और मायावी राजकुमार था—विद्युतजिह्वा। विद्युतजिह्वा साधारण योद्धा नहीं था। जब वह युद्ध के मैदान में पूरी शक्ति से गर्जना करता था, तो उसके मुख से बिजली जैसी नीली आभा निकलती थी, जिसके कारण उसका नाम ‘विद्युतजिह्वा’ पड़ा। कालकेय वंश और रावण के राक्षस वंश में पीढ़ियों से संप्रभुता को लेकर मतभेद थे, क्योंकि कालकेय दानव समुद्र के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण रखते थे, जो लंका की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती था।
दूसरी ओर, लंका की राजकुमारी शूर्पणखा (जिसका मूल नाम मीनाक्षी या चंद्रनखा भी मिलता है) लंका के कठोर राजसी नियमों और युद्ध के वातावरण से दूर एकांत प्रिय थी। उसके पास रूप बदलने की कला (कामरूपिणी विद्या) थी, जिसका उपयोग वह महल के बंधनों से मुक्त होकर प्रकृति के करीब जाने के लिए करती थी। एक बार शूर्पणखा लंका की सीमाओं को लांघती हुई सुदूर दक्षिण के एक एकांत और सुंदर द्वीप पर पहुँची। वहाँ उसने अपना राक्षसी रूप त्यागकर एक साधारण सुंदरी का रूप धारण किया और झरने के पास बैठकर वीणा बजाने लगी। उसी समय विद्युतजिह्वा भी अपनी टोली के साथ वहाँ से गुजर रहा था। वीणा की सम्मोहक ध्वनि सुनकर वह वहाँ पहुँचा।
जब दोनों का सामना हुआ, तो राजनीतिक शत्रुता के बावजूद वे एक-दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। शूर्पणखा को विद्युतजिह्वा का स्वतंत्र स्वभाव पसंद आया और विद्युतजिह्वा उसकी कला पर मुग्ध हो गया। दोनों ने अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर कई मुलाक़ातें कीं और अंततः दोनों के बीच प्रेम प्रगाढ़ हो गया। वे जानते थे कि राक्षस और दानव कुलों के बीच पुराना वैर होने के कारण समाज इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए, उन्होंने प्रकृति को साक्षी मानकर गांधर्व विवाह (गुप्त विवाह) कर लिया। इस विवाह से कालान्तर में उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम शंभू कुमार (कुछ ग्रंथों में जम्बुमाली या शंबूक) रखा गया। शूर्पणखा ने अपने पुत्र की सुरक्षा के लिए उसे दंडकारण्य के पंचवटी वनों में एक गुप्त स्थान पर रखा, जहाँ वह सूर्य देव की उपासना करने लगा।
सत्य अधिक समय तक गुप्त नहीं रह सका। रावण के गुप्तचरों ‘शुक’ और ‘सारण’ ने लंका के राजदरबार में इस विवाह की सूचना दे दी। यह सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हुआ, क्योंकि उसकी बहन ने लंका के शत्रु कुल के राजकुमार से संबंध बनाया था। रावण तुरंत विद्युतजिह्वा पर आक्रमण करने निकला, परंतु शूर्पणखा ने रावण के सामने आकर अपने सुहाग की रक्षा के लिए बहुत विलाप किया। अपनी बहन के प्रति स्नेह और लोक-लाज के कारण रावण ने अपना क्रोध शांत किया और विद्युतजिह्वा के सामने एक राजनैतिक शर्त रखी: उसे अपना स्वतंत्र राज्य छोड़कर लंका की अधीनता स्वीकार करनी होगी और रावण की सेना में सेवा देनी होगी। विद्युतजिह्वा ने अपनी पत्नी और पुत्र के भविष्य की रक्षा के लिए यह अपमानजनक समझौता स्वीकार कर लिया, परंतु उसके मन में अपनी स्वतंत्रता खोने का मलाल हमेशा रहा।
कुछ समय पश्चात, रावण ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए ‘विश्व विजय अभियान’ प्रारंभ किया। इस अभियान में विद्युतजिह्वा को भी रावण की सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व करना पड़ा। जब रावण की सेना अन्य लोकों पर विजय प्राप्त कर अंतरिक्ष के मार्ग से वापस लंका लौट रही थी, तब कालकेय दानवों की एक अन्य टुकड़ी ने रावण की सेना पर अचानक धावा बोल दिया। युद्ध की उस अराजकता में, विद्युतजिह्वा के भीतर दबा हुआ रोष बाहर आ गया। उसने सोचा कि रावण के बढ़ते अहंकार और अपनी दासता को समाप्त करने का यही एकमात्र अवसर है। उसने युद्ध के मैदान में पीछे से रावण पर वार करने का प्रयास किया।
परंतु रावण युद्ध कला में अत्यंत निपुण था। उसने तुरंत स्थिति को भांप लिया और विद्युतजिह्वा का वार विफल कर दिया। अपनी ही सेना के सेनापति द्वारा इस विश्वासघात को देखकर रावण का क्रोध चरम पर पहुँच गया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें रावण ने अपने दिव्य चंद्रहास खड्ग से विद्युतजिह्वा का वध कर दिया। जब रावण ने विद्युतजिह्वा के शव को शूर्पणखा के सामने प्रस्तुत किया, तो वह गहरे शोक में डूब गई। एक पत्नी के रूप में उसके भीतर रावण के प्रति तीव्र प्रतिशोध की भावना जागृत हुई। उसने रोते हुए रावण से कहा कि जिस अहंकार में आकर उसने अपनी बहन का घर उजाड़ा है, वही अहंकार एक दिन लंका के विनाश का कारण बनेगा और उसका यह साम्राज्य एक स्त्री के निमित्त ही नष्ट हो जाएगा।
इसके बाद शूर्पणखा लंका का परित्याग कर पंचवटी के वनों में अपने पुत्र शंभू कुमार के पास रहने चली गई। नियति का चक्र यहाँ नहीं रुका। वनवास के दौरान भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण भी पंचवटी में निवास कर रहे थे। एक दिन, जब शंभू कुमार अपनी तपस्या के अंतिम चरण में था, आकाश से सूर्य देव द्वारा भेजी गई एक दिव्य तलवार झाड़ियों में आकर गिरी। वन में लकड़ियाँ एकत्रित करते समय लक्ष्मण जी की दृष्टि उस चमकीली तलवार पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकतावश उसे उठाया और उसकी धार को परखने के लिए सामने की घनी झाड़ी पर वार कर दिया। दुर्भाग्यवश, उस झाड़ी के पीछे शंभू कुमार तपस्या में लीन था और लक्ष्मण के अनजाने में किए गए वार से उसकी मृत्यु हो गई।
पति के बाद अपने इकलौते पुत्र को भी खो देने के बाद शूर्पणखा पूरी तरह टूट चुकी थी। वह जानती थी कि वह स्वयं न तो रावण से बदला ले सकती है और न ही राम-लक्ष्मण से। तब उसने अपनी राजनीतिक और मानसिक चतुरता का उपयोग करते हुए एक भयंकर योजना बनाई। वह सुंदर रूप धारण कर राम और लक्ष्मण के समीप गई, जहाँ विवाद बढ़ने पर लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान काट दिए। इसके बाद वह रक्त से लथपथ होकर रावण के पास पहुँची। उसने रावण को यह नहीं बताया कि उसका पुत्र मारा गया है या वह अपनी व्यक्तिगत बेइज्जती का बदला लेना चाहती है, बल्कि उसने रावण के राजा होने के अहंकार को उकसाने के लिए माता सीता के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन किया। रावण अपनी बहन की यह दशा देखकर और अपने अहंकार के वश में होकर माता सीता के हरण के लिए विवश हुआ, जो अंततः लंका के समूल नाश और रावण के अंत का कारण बना। इस प्रकार, इतिहास के पन्नों में छिपी विद्युतजिह्वा की यह कथा स्पष्ट करती है कि रामायण के महान युद्ध के पीछे कई अनसुने पारिवारिक और राजनैतिक कारण भी सक्रिय थे।
राहत टीकमगढ़