परिवार का इस दुनिया मे कोई भी सानी नही है।मगर रिश्ता यहाँ का कोई भी हो बेमानी नही है।
कुछ लोग कहते है कि सभी साथ छोड़ जाते है।
जीवनभर साथ देती किसी की भी जवानी नही है।
आप है इसलिए अच्छा लगता हैं कहने के लिए , लिखने के लिए यह बात अच्छी लगती है लेकिन आज अपनों का, रिश्तों का कहीं कोई मूल्य नही रहा । पिता, पुत्र भाई, बहन सिर्फ और सिर्फ सम्पत्ति के पीछे रिश्ते जोड़ते है और तोड़ते है । रिश्तों की अहमियत नहीं समझते! सम्पत्ति के लिए भाई भाई का खून कर रहा है बेटा माँ का खून कर रहा है रिश्तों की अब किसी को फिक्र नहीं!फिर भी हमे जीवन के अन्तिम पड़ाव में अपने परिजनों- रिश्तों की जरूरत होती है ।पद, पैसा और प्रतिष्ठा के बाद भी अगर मन अकेला रह जाए तो जिंदगी की सबसे बड़ी कमी क्या है?
हाल ही में दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राकेश मेहता के निधन की खबर ने मन को भीतर तक झकझोर दिया।राकेश मेहता 1975 बैच के आईएएस अधिकारी थे। उन्होंने दिल्ली के मुख्य सचिव सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभाई और 2010 में सेवानिवृत्त हुए। कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली के प्रशासन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।
लेकिन जिंदगी का एक अजीब सच देखिए—जिस व्यक्ति का पूरा जीवन हजारों लोगों, जिम्मेदारियों
अधिकारियों और सत्ता के गलियारों के बीच गुजरा, जीवन के अंतिम दौर में वह नोएडा में अकेले रह रहे थे।उनकी पत्नी भी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। उनका बेटा पढ़ाई कर रहा है और बेटी विदेश में रहती है। पुलिस के अनुसार उनकी मृत्यु के मामले में एक नोट मिला, जिसमें लंबे समय से बीमारी का उल्लेख था।
उनके अंतिम निर्णय के पीछे वास्तविक मनःस्थिति क्या थी, यह हम बाहर बैठकर निश्चित रूप से नहीं जान सकते। लेकिन उनकी मृत्यु ने एक बहुत बड़ा सवाल जरूर हमारे सामने खड़ा कर दिया है—क्या हमने जिंदगी में पैसा और पद तो खूब कमाया, लेकिन रिश्ते कमाने में कहीं कमी तो नहीं छोड़ दी? यह सवाल केवल आईएएस अधिकारियों के लिए नहीं है।यह सवाल जजों से है।यह सवाल आईपीएस अधिकारियों से है।
यह सवाल नेताओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों और करोड़पति-अरबपतियों से है।और सबसे ज्यादा यह सवाल हम सब से है।
हम जिंदगी भर कमाते हैं।घर बनाते हैं।बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं।
बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं।कारें बदलते हैं।व्यवसाय बढ़ाते हैं।पद और प्रतिष्ठा हासिल करते हैं।
लेकिन इसी दौड़ में कभी-कभी हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पास बैठकर दो शब्द बोलने वाला अपना कौन है?कुर्सी जाती है तो भीड़ भी चली जाती है
मैंने ऐसे अनेक प्रभावशाली लोगों के बारे में देखा और सुना है, जिनके एक फोन पर अधिकारी दौड़े चले आते थे।जिनसे मिलने के लिए लोग समय मांगते थे।
जिनकी एक आवाज पर फाइलें तेजी से चलती थीं।लेकिन जीवन का नियम है—कुर्सी स्थायी नहीं है।पद स्थायी नहीं है।प्रभाव स्थायी नहीं है।और सबसे बड़ी बात—भीड़ भी स्थायी नहीं है।जब तक आपके पास पद है, आपके आसपास बहुत से लोग दिखाई दे सकते हैं।
लेकिन जब पद चला जाता है, तो पता चलता है कि उनमें से कितने लोग वास्तव में आपके अपने थे।
सुब्रत राय सहारा की कहानी भी बहुत कुछ कहती है
देश के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाने वाले सुब्रत राय सहारा का जीवन भी इस विषय पर सोचने को मजबूर करता है।
एक समय ऐसा था जब उनके आसपास देश के बड़े नेता, अभिनेता, उद्योगपति और हजारों कर्मचारी दिखाई देते थे। उनका सहारा समूह देशभर में एक बड़ा नाम था।लेकिन नवंबर 2023 में जब उनका निधन हुआ, तब उनके दोनों बेटे अंतिम संस्कार में उपस्थित नहीं हो सके। रिपोर्टों के अनुसार वे विदेश में रह रहे थे और परिस्थितियों के कारण भारत नहीं आ पाए। अंततः उनके पोते ने अंतिम संस्कार किया। उनकी पत्नी स्वप्ना राय भी परिवार के साथ मौजूद थीं और अंतिम संस्कार में परिवार के सदस्य उपस्थित थे।इस घटना को केवल परिवार की मजबूरी याअनुपस्थिति के रूप में देखना चाहिए—किसी पर दोषारोपण के रूप में नहीं।
लेकिन यह घटना हमें जीवन का एक बड़ा संदेश जरूर देती है—
जिस व्यक्ति के आसपास कभी हजारों लोगों की भीड़ रहती थी, अंतिम यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण वही होते हैं जिनसे आपका वास्तविक आत्मीय रिश्ता होता है।
भीड़ और अपने लोगों में बहुत अंतर होता है!
पैसा बैंक में जमा होता है, रिश्ते दिल में पैसा कमाना गलत नहीं है।
बल्कि पैसा जीवन की जरूरत है।
बच्चों के भविष्य के लिए पैसा चाहिए। इलाज के लिए पैसा चाहिए।घर और व्यवसाय के लिए पैसा चाहिए।सम्मानजनक जीवन के लिए पैसा चाहिए।इसलिए मैं यह नहीं कहता कि पैसा मत कमाइए।मैं तो कहता हूं—
पैसा जरूर कमाइए, खूब कमाइए। लेकिन रिश्तों को गरीब मत होने दीजिए।क्योंकि पैसा बैंक खाते में जमा होता है।रिश्ते इंसानों के दिल में जमा होते हैं।बैंक खाते का बैलेंस एक क्लिक में देखा जा सकता है।लेकिन रिश्तों का बैलेंस तब पता चलता है जब जिंदगी में कोई मुश्किल आती है।
क्या आपने किसी का आंसू पोंछा है?कभी अपने आप से पूछिए—
क्या आपने किसी दोस्त की परेशानी में उसका हाथ पकड़ा?
किसी रिश्तेदार की बीमारी में उसके घर पहुंचे? किसी पुराने मित्र को बिना किसी काम के फोन किया? किसी नाराज व्यक्ति को मनाने की कोशिश की? किसी के दुख में बिना बुलाए पहुंच गए?
किसी की खुशी में बिना स्वार्थ शामिल हुए?
अगर आपने यह किया है तो समझिए आपने जीवन में बहुत बड़ी संपत्ति अर्जित की है।
क्योंकि जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर इंसान को हमेशा बहुत सारे लोग नहीं चाहिए होते।उसे कुछ अपने लोग चाहिए होते हैं।
ऐसे लोग—जिनके सामने वह अपना पद भूल सके।अपनी प्रतिष्ठा भूल सके।अपना पैसा भूल सके।अपनी उपलब्धियां भूल सके।और सिर्फ एक सामान्य इंसान की तरह बैठ सके।
ऐसे लोग जिनके सामने वह कह सके—आज मन ठीक नहीं है।”और सामने वाला पूछे भी नहीं—
बस उसके पास बैठ जाए।
आईएएस हो या आम इंसान, अकेलापन पद देखकर नहीं आता
आईएएस अधिकारी होना बहुत बड़ी उपलब्धि है।जज होना सम्मान की बात है।आईपीएस अधिकारी होना गौरव की बात है।उद्योगपति होना सफलता का प्रतीक हो सकता है।लेकिन इन उपलब्धियों के साथ एक खतरा भी है—
कहीं व्यक्ति अपने पद को ही अपनी पहचान न समझ बैठे।
क्योंकि एक दिन सेवानिवृत्ति आती है।एक दिन कुर्सी चली जाती है।
एक दिन फोन कम बजता है।
एक दिन लोग दूसरे अधिकारियों के पास चले जाते हैं।और तब व्यक्ति के पास उसका परिवार, उसके मित्र और उसके पुराने रिश्ते ही रह जाते हैं।इसलिए नौकरी के दौरान भी रिश्ते बनाइए।व्यस्तता के बावजूद परिवार को समय दीजिए।बच्चों से बात कीजिए।
जीवनसाथी की बात सुनिए।
पुराने दोस्तों से संपर्क रखिए।
कभी किसी के घर बिना किसी काम के चले जाइए।किसी के साथ बैठकर चाय पीजिए।क्योंकि रिटायरमेंट की तैयारी सिर्आर्थिक रूप से नहीं, भावनात्मक रूप से भी करनी चाहिए।
सबसे जरूरी है मन की बात कहना
अगर मन लगातार उदास रहता है…नींद खराब रहती है…भीतर बेचैनी रहती है…जीवन बोझ जैसा लगने लगता है…या कभी ऐसा विचार आता है कि अब जीने का कोई अर्थ नहीं है…तो इसे कमजोरी मत समझिए।किसी अपने से बात कीजिए।परिवार से बात कीजिए।मित्र से बात कीजिए।डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लीजिए।और यदि आपके आसपास कोई व्यक्ति अचानक बहुत चुप हो जाए, लोगों से कटने लगे, निराशा की बातें करे या बार-बार कहे कि “अब सब खत्म हो गया”, तो उसे अकेला मत छोड़िए।
उसके पास बैठिए।उसकी बात सुनिए।उसे डांटिए मत।उसकी भावनाओं को छोटा मत समझिए।
कभी-कभी किसी की जिंदगी बचाने के लिए बड़े-बड़े भाषण नहीं, सिर्फ किसी अपने का साथ पर्याप्त हो सकता है।
जीवन की असली कमाई क्या है?राकेश मेहता जी के निधन की खबर हो या सुब्रत राय सहारा के जीवन का अंतिम अध्याय—इन घटनाओं को देखकर हमें किसी के निजी जीवन पर फैसला सुनाने के बजाय अपने जीवन की ओर देखना चाहिए।
क्योंकि सवाल यह नहीं है कि उनके पास कितना पैसा था।
सवाल यह है कि हमारे पास कितने ऐसे लोग हैं जिनके सामने हम अपने मन की बात कह सकते हैं?हम सबको एक दिन इस दुनिया से जाना है।कोई पद साथ नहीं जाएगा।कोई कुर्सी साथ नहीं जाएगी।बड़ा घर साथ नहीं जाएगा।बैंक बैलेंस साथ नहीं जाएगा।
साथ जाएगा तो केवल हमारा व्यवहार, हमारी यादें और लोगों के दिल में हमारे लिए बचा हुआ प्रेम।
इसलिए आज ही किसी पुराने दोस्त को फोन कीजिए।
किसी नाराज रिश्तेदार से बात कीजिए।अपने बच्चों के साथ बैठिए।अपने माता-पिता या बुजुर्गों के पास कुछ समय बिताइए।
जीवनसाथी के साथ चाय पीजिए।
और किसी ऐसे व्यक्ति से जरूर पूछिए—“भाई, कैसे हो?”
हो सकता है सामने वाला सिर्फ इसी सवाल का इंतजार कर रहा हो।
अंत में बस इतना ही—पैसा जरूर कमाइए, लेकिन रिश्तों को गरीब मत होने दीजिए।
**क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत वह नहीं, जो बैंक में जमा है;
बल्कि वह है जो किसी के दिल में आपके नाम से जमा है।**
और जीवन की सबसे बड़ी सफलता शायद यह नहीं कि आपके जाने पर कितने लोग आपके नाम का गुणगान करें—
बल्कि यह है कि आपके रहते हुए कुछ लोग आपको देखकर दिल से कह सके“आप हैं, इसलिए अच्छा लगता है।
मनोहर चावला