अजमेर, 16 अक्टूबर। ग्राहृय परीक्षण केन्द्र तबीजी फार्म के उप निदेशक कृषि (शस्य) श्री मनोज कुमार शर्मा ने बताया की सरसों एक प्रमुख तिलहन फसल हैं। वर्तमान में सरसों की फसल की बुवाई का उपयुक्त समय हैं। इस फसल में झुलसा, तुलासिता, सफेद रोली, दीमक एवं एफिड़ (माहु या चैंपा) जैसे रोगों एवं कीटों का प्रकोप होता हैं। किसान उपरोक्त रोगों व कीटों से बचाव हेतु बीजोपचार व भूमि उपचार करें एवं उपचार करते समय पूरे कपड़े, मास्क व दस्तानों का उपयोग अवश्य करें।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (पौध व्याधि) श्री सुरेन्द्र सिंह ताकर ने बताया कि सरसों की फसल को रोगों से समुचित बचाव के लिए मृदा उपचार, बीजोपचार एवं रोग प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करना चाहिए। किसान बुवाई से पूर्व 2.5 किलो ट्राइकोडर्मा 100 किलो आर्द्रता युक्त गोबर की खाद में मिलाकर पलेवा करते समय एक हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलावें। साथ ही ढ़ाई ग्राम मैन्कोजेब अथवा 6 ग्राम मेटालेक्सील 35 प्रतिशत डब्ल्यूएस या 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट) डॉ. सुरेश चौधरी ने बताया कि सरसों की फसल को दीमक व अन्य कीटों से बचाव हेतु अंतिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर सेखेत में डाल कर जुताई करें एवं एफिड से बचाव हेतु इमिडाक्लोप्रिड 600 एफएस की 9 मिली प्रति किलो बीज की दर से बीजापचार करें।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (रसायन) डॉ. कमलेश चौधरी ने बताया कि सरसों की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए उर्वरकों का उपयोग सही समय पर मृदा परीक्षण सिफारिश के आधार पर उपयुक्त व संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में 60 किलो नत्रजन और 30-40 किलो फास्फोरस देवें व 80 किलो जिप्सम प्रति हैक्टर अन्तिम जुताई के समय ऊर कर देवें, सरसों फसल में फास्फोरस की मात्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट उर्वरक सें देवे। इससे तेल की मात्रा में बढोत्तरी होती है तथा असिंचित क्षेत्रों में उर्वरकों की आधी मात्रा बुवाई के समय ऊर कर देवें।