कांग्रेस पार्षदों पर संगठन की पकड़ कमजोर क्यों?

ऐसा पाया गया है कि कांग्रेस के निर्वाचित पार्शद संगठन के नियंत्रण में नहीं रहते। जब तक उन्हें टिकट चाहिए, तब तक तो संगठन पदाधिकारियों की मिजाजपुर्सी करते हैं, मगर जीतने के बाद अपनी स्वतंत्र सत्ता मानते हैं। संगठन की ओर से जारी निर्देष्ज्ञ मानने में आनाकानी करते हैं, अथवा उसे नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसा पूर्व में भी देखा गया और हाल ही फिर पाया गया है। यही वजह है कि अजमेर नगर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ राजकुमार जयपाल को फरमान जारी करना पडता है। ज्ञातव्य है कि एक फरमान में उन्होंने कहा कि दिनांक 28 सितंबर 2026 को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देशानुसार जयपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय विशाल धरना-प्रदर्शन कार्यक्रम में सभी पार्षदों की उपस्थिति अपेक्षित थी। यह संज्ञान में आया है कि कुछ पार्षद उक्त महत्वपूर्ण संगठनात्मक कार्यक्रम में अनुपस्थित रहे। अतः जिन पार्षदों की कार्यक्रम में उपस्थिति नहीं रही, वे उनके समक्ष अपनी अनुपस्थिति का कारण स्पष्ट करते हुए लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। संगठन द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों में बिना पूर्व सूचना अथवा उचित कारण के अनुपस्थित रहना संगठनात्मक अनुशासन की दृष्टि से गंभीर विषय माना जाएगा। भविश्य में यदि कोई पार्षद लगातार संगठनात्मक कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखता है अथवा बिना उचित कारण अनुपस्थित रहता है, तो यह माना जाएगा कि वह संगठनात्मक गतिविधियों के प्रति सक्रिय नहीं है। ऐसी स्थिति में संगठन के नियमानुसार संबंधित पार्षद के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि बाद में अजमेर की समस्याओं को लेकर सभी पार्शदों से कहा गया था कि वे निगम अधिकारियों से मिलने के लिए आएं तो संख्या अपेक्षाकृत संतोशजनक थी, वह इसलिए कि अभी नेता प्रतिपक्ष का चुनाव होना बाकी है।
खैर, मोटे तौर पर सवाल उठता है कि आखिर पार्शद अमूमन संगठन के नियंत्रण में क्यों नहीं रहते? वस्तुतः पार्षद का पद और पार्टी की सदस्यता अलग-अलग हैं। पार्टी निलंबन एक संगठनात्मक पार्टी अनुशासन की कार्रवाई है। इससे वह व्यक्ति अपने-आप नगर निगम का निर्वाचित सदस्य नहीं रहता, ऐसा राजस्थान नगरपालिकाओं से संबंधित कानून में नहीं है।
राजस्थान म्यूनिसिपटल एक्ट 2009 की धारा 39 में पार्षद को पद से हटाने के लिए अलग-अलग वैधानिक आधार और प्रक्रिया निर्धारित है। केवल राजनीतिक दल द्वारा निलंबन उस धारा में अपने-आप पद समाप्त करने का आधार नहीं बनता। यानि पार्टी से निष्कासन पर भी अपने-आप पार्षद पद नहीं छीनता। इसके अतिरिक्त यदि पार्षद ने चुनाव किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में जीता है, तो किसी विशेष मतदान या पार्टी निर्देश की अवहेलना की स्थिति में दल-बदल संबंधी वैधानिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। प्रसंगवष्ज्ञ बता दें कि धारा 39 के तहत राज्य सरकार द्वारा सदस्य को हटाने की प्रक्रिया है और कुछ मामलों में जांच तथा न्यायिक अधिकारी की भूमिका भी आती है। जब तक कानून के अनुसार हटाने का आदेश नहीं होता, सदस्य अपने पद पर बना रहता है। वह कांग्रेस का निलंबित सदस्य हो सकता है, लेकिन नगर निगम का निर्वाचित पार्षद बना रह सकता है।
हाँ, यदि उसके विरुद्ध दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की कार्यवाही या राजस्थान नगरपालिका कानून के तहत कोई अलग वैधानिक कार्यवाही होती है, तो परिणाम अलग हो सकता है।

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