अंतर्राष्ट्रीय तनाव जागरूकता दिवस (4 नवंबर 2026) पर विशेषः
जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य ने संसार को सुविधाओं से भर दिया, लेकिन स्वयं के भीतर सुकून के लिए जगह कम कर ली। आज हमारे पास समय बचाने के असंख्य साधन हैं, पर समय का अभाव है, संवाद के अनगिनत माध्यम हैं, पर आत्मीयता का अकाल है, भौतिक समृद्धि के नए प्रतिमान हैं, लेकिन मानसिक शांति निरंतर दूर होती जा रही है। आधुनिक मनुष्य की इस विरोधाभासी स्थिति का सबसे बड़ा नाम है-तनाव। तनाव अब केवल मन की बेचैनी नहीं, बल्कि हमारे समय की एक गंभीर सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक और वैश्विक चुनौती बन चुका है। इसी चुनौती के प्रति चेतना जगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय तनाव जागरूकता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इसकी थीम है- ‘‘तनाव-मुक्ति और कल्याण के भविष्य को आकार देना तथा कार्यस्थल को फिर से मानवीय बनाना।’’ यह विषय हमें याद दिलाता है कि कार्यस्थल केवल उत्पादन और उपलब्धियों का केंद्र नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य का भी स्थान होना चाहिए। आज का मनुष्य सुबह आंख खुलने से लेकर रात आंख बंद होने तक एक अदृश्य दौड़ में शामिल है। नौकरी की असुरक्षा, व्यवसाय की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक अपेक्षाएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां, बच्चों की शिक्षा, युवाओं के भविष्य की चिंता, बुजुर्गों का अकेलापन और सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने का दबाव उसके मन को लगातार मथता रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में अंक और प्रतियोगिता बच्चों के बचपन पर भारी पड़ रहे हैं। कार्यस्थलों पर लक्ष्य, समय-सीमा और प्रदर्शन का दबाव व्यक्ति को मशीन में बदलने लगा है। परिवारों में संवाद की जगह मोबाइल ने और आत्मीयता की जगह औपचारिकताओं ने ले ली है।
इस व्यक्तिगत तनाव के ऊपर वैश्विक परिस्थितियों का बोझ भी कम नहीं है। युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं की खबरें मनुष्य के भीतर भय और असुरक्षा का वातावरण निर्मित करती हैं। दुनिया के किसी कोने में होने वाला संघर्ष अब केवल उस क्षेत्र की समस्या नहीं रहता, बल्कि संचार माध्यमों के कारण पूरी मानवता की सामूहिक चिंता बन जाता है। इस प्रकार तनाव की सीमाएं घर की चारदीवारी से निकलकर राष्ट्रों और महाद्वीपों तक फैल गई हैं। तनाव को यदि समय रहते समझा और नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह शरीर और मन दोनों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। लगातार तनाव से नींद में गड़बड़ी, उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी समस्याएं, पाचन संबंधी परेशानियां, चिड़चिड़ापन, अवसाद और एकाग्रता में कमी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। तनाव मनुष्य की निर्णय क्षमता को कमजोर करता है और उसके संबंधों में कटुता घोल देता है। कहावत है-‘चिंता चिता समान है।’ यह केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है। चिंता भविष्य की अनिश्चितताओं को वर्तमान की खुशियों पर हावी कर देती है। इसलिए तनाव से मुक्ति का पहला कदम है-अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करना, समस्याओं को पहचानना और उनके समाधान की दिशा में विवेकपूर्ण प्रयास करना। इस संदर्भ में जैन धर्म के महान आध्यात्मिक आचार्य आचार्य श्री महाप्रज्ञ द्वारा विकसित एवं व्यवस्थित की गई प्रेक्षाध्यान पद्धति तनावमुक्त जीवन का एक अत्यंत प्रभावशाली मार्ग प्रस्तुत करती है। प्रेक्षाध्यान का मूल भाव है-देखना, जागरूक होकर देखना और अपने भीतर घटित होने वाली प्रक्रियाओं को निष्पक्ष भाव से समझना। यह केवल आंखें बंद करके बैठने की क्रिया नहीं, बल्कि स्वयं से साक्षात्कार करने की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक साधना है। आचार्य महाप्रज्ञ ने ध्यान, श्वास-प्रेक्षा, शरीर-प्रेक्षा, चौतन्य-केंद्र प्रेक्षा और अनुप्रेक्षा जैसे प्रयोगों के माध्यम से मनुष्य को अपने मन, शरीर और भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा दी।
प्रेक्षाध्यान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है-भावनात्मक संतुलन। क्रोध, भय, ईर्ष्या, आवेश और निराशा जैसी वृत्तियों को पहचानकर उनके परिष्कार का प्रयास करना तनाव प्रबंधन की दिशा में सार्थक कदम है। प्रतिदिन 15 से 20 मिनट का नियमित ध्यान, श्वास पर एकाग्रता और आत्मनिरीक्षण व्यक्ति के जीवन में धैर्य, सहनशीलता तथा मानसिक स्थिरता विकसित कर सकते हैं। इस साधना का संदेश है कि परिस्थितियों को हमेशा बदलना संभव नहीं, लेकिन परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया बदलना हमारे हाथ में है। भारत की आध्यात्मिक परंपरा भी तनावमुक्त जीवन का अनमोल दर्शन प्रस्तुत करती है। उपनिषदों का आत्मबोध, गीता का निष्काम कर्मयोग, भगवान महावीर का समता दर्शन, भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग और पतंजलि का अष्टांग योग मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाने की प्रेरणा देते हैं। गीता का संदेश है-कर्म करो, फल की चिंता में स्वयं को मत उलझाओ। इसका अर्थ कर्म से पलायन नहीं, बल्कि परिणाम के अनावश्यक भय से मुक्त होकर पूरी निष्ठा से अपने दायित्वों का निर्वहन करना है। योग, प्राणायाम, ध्यान, मौन, स्वाध्याय और नियमित दिनचर्या मनुष्य को मानसिक संतुलन प्रदान करने के प्रभावी माध्यम हैं।
हमारी त्योहार संस्कृति भी तनाव के विरुद्ध एक सुंदर सामाजिक एवं सांस्कृतिक औषधि है। दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प देती है। होली मन के पुराने विकारों और कटु स्मृतियों को रंगों में बहाकर संबंधों में नई आत्मीयता भरने का अवसर देती है। रक्षाबंधन रिश्तों की सुरक्षा और विश्वास का उत्सव है। ईद भाईचारे, सेवा और साझी खुशियों का संदेश देती है, तो क्रिसमस प्रेम, करुणा और क्षमा की प्रेरणा देता है। पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि, क्षमाभाव, संयम और आत्मनिरीक्षण का अवसर प्रदान करता है। विशेषकर क्षमापना का भाव मनुष्य के भीतर वर्षों से संचित कटुता और प्रतिशोध की गांठें खोल सकता है। त्योहारों का वास्तविक आनंद तभी है जब वे केवल बाहरी सजावट और खर्च तक सीमित न रहकर मनुष्यों को मनुष्यों के करीब लाएं। सामूहिक उत्सव, पारिवारिक मिलन, लोकगीत, संगीत, सेवा और प्रकृति के साथ जुड़ाव जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। तनावमुक्त समाज के निर्माण में कार्यस्थलों, शिक्षण संस्थानों और परिवारों की भूमिका भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कार्यालयों में मानवीय व्यवहार, काम और विश्राम के बीच संतुलन, सहकर्मियों के प्रति संवेदनशीलता तथा मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। विद्यालयों में बच्चों की तुलना करने के बजाय उनकी प्रतिभा को समझना आवश्यक है। परिवारों में एक-दूसरे को सुनने, साथ बैठने और भावनाओं को साझा करने की संस्कृति विकसित करनी होगी। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, प्रकृति के सान्निध्य और डिजिटल माध्यमों के विवेकपूर्ण उपयोग को जीवनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए। गंभीर या लगातार बने रहने वाले तनाव में मनोवैज्ञानिक अथवा योग्य चिकित्सक की सहायता लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।
वस्तुतः तनाव से मुक्ति का अर्थ चुनौतियों से भागना नहीं, बल्कि चुनौतियों के बीच भी स्वयं को संभालकर रखना है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे, परिस्थितियां बदलती रहेंगी, अपेक्षाएं जन्म लेती रहेंगी, लेकिन इन सबके बीच मनुष्य अपने भीतर शांति का एक ऐसा दीप जला सकता है, जिसकी रोशनी बाहरी अंधेरों से प्रभावित न हो। हमें समझना होगा कि सफलता का अर्थ केवल अधिक पाना नहीं, बल्कि जो प्राप्त है उसमें संतोष, संबंधों में मधुरता और मन में संतुलन बनाए रखना भी है। अंततः जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं कि हमने कितनी ऊंचाइयां छुईं, बल्कि इस बात में है कि उन ऊंचाइयों तक पहुंचते हुए अपने भीतर की शांति कितनी बचाकर रखी। तनाव को जीवन का स्वामी नहीं, अपनी जागरूकता से नियंत्रित की जाने वाली स्थिति बनाना ही इस दिवस का वास्तविक संदेश है। आइए, हम ऐसी जीवनशैली और ऐसी सामाजिक संस्कृति का निर्माण करें, जहां प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग, उपलब्धियों से अधिक आत्मीयता और भौतिक प्रगति से अधिक मानवीय संवेदनाओं का सम्मान हो। क्योंकि स्वस्थ मन ही स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज और शांतिपूर्ण विश्व की आधारशिला है।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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