भाजपा भ्रम में तो कांग्रेस का भ्रम टूटा

दो निर्दलीय मुस्लिम पार्शदों के कदम ने चौंकाया

भाजपा ने अजमेर नगर निगम बोर्ड में अपना कुनबा बढ़ाते हुए पार्षदों की संख्या 32 से बढ़ाकर 40 कर ली है। भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव जीतने वाले छह पार्षदों के अलावा दो अन्य निर्दलीय मुस्लिम पार्षदों अजहर खान व सूफिया कुरैषी ने भी विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की मौजूदगी में भाजपा का दामन थाम लिया। बेशक, यह घटनाक्रम भाजपा के लिए एक सुखद राजनीतिक उपलब्धि है। इससे निगम में उसकी ताकत बढ़ी है। जाहिर है कि इस घटनाक्रम से न केवल देवनानी की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हुई है, बल्कि संगठन पर उनकी पकड़ भी पहले से अधिक पुख्ता हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा रेखांकित करने वाली बात यह है कि जिन मुस्लिम बहुल इलाकों में भाजपा को अब तक गिनती के वोट हासिल होते रहे हैं, वहां अब उसके पास दो मुस्लिम पार्षद भी हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इसे कमतर करके नहीं आंका जा सकता। भाजपा ने मुस्लिम बहुल इलाकों में सेंधमारी की है और इसके राजनीतिक मायने दूरगामी हो सकते हैं।
हालांकि, गहरी राजनीतिक समझ रखने वाले इसे भाजपा की एक तरह की गलतफहमी और कांग्रेस की गलतफहमी टूटने के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि महज दो मुस्लिम पार्षदों के भाजपा में शामिल हो जाने से यह मान लेना सियासी नादानी होगी कि उन्हें चुनाव में मिले तमाम वोट अब भाजपा की झोली में आ गिरेंगे। किसी प्रत्याशी को मिलने वाले वोटों के पीछे उसकी व्यक्तिगत छवि, संपर्क, व्यवहार और स्थानीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं। लिहाजा, निर्दलीय रहते हुए जिन मतदाताओं ने उन्हें समर्थन दिया, जरूरी नहीं कि वे भाजपा के चुनाव चिह्न पर भी उनके साथ खड़े नजर आएं। यहां एक दिलचस्प सवाल भी उठता है कि यदि भाजपा आगामी निगम चुनाव में इन पार्षदों को अपने चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारती है तो क्या वे जीत का सिलसिला बरकरार रख पाएंगे? निगम चुनाव में मतदाताओं ने उन्हें उनकी व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय लोकप्रियता के आधार पर समर्थन दिया था। मगर जब वे भाजपा का झंडा लेकर मैदान में उतरेंगे तो क्या वही मतदाता भाजपा के प्रति अपनी तमाम राजनीतिक हिचक छोड़कर उनके साथ खड़े होंगे? और क्या विधानसभा चुनाव में भी इन इलाकों के मतदाता भाजपा को उसी तरह समर्थन देंगे? इन सवालों का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।

विचारणीय पहलू यह भी है कि क्या इन मुस्लिम पार्षदों के समर्थक उनके भाजपा में शामिल होने के फैसले को सहजता से स्वीकार कर लेंगे? हालांकि, इन पार्षदों के पास अपना एक दमदार तर्क जरूर होगा। वे कह सकते हैं कि निर्दलीय पार्षद के रूप में रहते हुए वार्ड का अपेक्षित विकास करवाना आसान नहीं है। सत्ता पक्ष के साथ रहकर ही विकास कार्यों को बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकता है। ऐसे में यदि वार्ड के विकास और जनहित को प्राथमिकता देते हुए उन्होंने भाजपा का दामन थामा है तो इसमें ऐतराज की क्या गुंजाइश है?
दूसरी ओर, इस तर्क को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि भले ही इन पार्षदों को मिले तमाम वोट भाजपा के खाते में स्थानांतरित न हों, मगर उसका वोट शेयर कुछ तो बढ़ेगा ही। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि निगम, राज्य और केंद्र तीनों जगह भाजपा सत्ता में है। ऐसे में यदि इन वार्डों में विकास कार्यों को गति मिलती है और स्थानीय समस्याओं का समाधान होता है तो भाजपा वहां अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में कामयाब हो सकती है।
अब बात कांग्रेस की। दरअसल, कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक गलतफहमी इस घटनाक्रम से जरूर टूटी है। उसे लगता रहा है कि मुस्लिम मतदाता उसकी जेब में हैं। मुस्लिम प्रत्याशी निर्दलीय चुनाव जीत भी जाए तो अंततः उसका झुकाव कांग्रेस की ओर ही रहेगा, क्योंकि भाजपा की तरफ जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। मगर दो मुस्लिम निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा में शामिल होकर कांग्रेस की इस पारंपरिक सोच को करारा झटका दिया है। यह कांग्रेस की रणनीतिक हार भी है।

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