बहराइच। उनका लिबास साध्वी जैसा है। माइक पर हों तो आवाज की धमक से ही लोग पहचान लेंगे कि और कोई नहीं, सावित्री बाई फुले हैं। वे मिशन 2012 में बलहा सुरक्षित क्षेत्र से खराब समय में भाजपा की खेवनहार बनीं, लेकिन उनका खुद का सियासी और पारिवारिक सफरनामा किसी मर्माहत करने वाले फलसफे से कम नहीं है।
यह वही सावित्री बाई फुले हैं, जिनके पिता आज्ञाराम और मां मायावती निरक्षर थे। महज छह साल की उम्र में तब शादी कर दी गई, जब सावित्री के हाथ में गुड्डा-गुड़िया के रूप में खिलौनों की दरकार थी। होश संभाला तो समाज के लोगों से जुड़ाव बना। हुसेनपुर मृदंगी गांव में पढ़ाने वाले मास्टरजी ने सावित्री को विकास का मर्म बताया। सावित्री कहती हैं कि उन्हें मास्टरजी की वह बातें आज भी याद हैं कि अगर आगे बढ़ना है तो किताबें पढ़नी पड़ेंगी। यहीं से सावित्री ने ठान ली कि बढ़ना है तो पढ़ना है। स्नातक तक पढ़ाई पूरी की। इस बीच, छोटी बहन शादी के योग्य हो गई थी। सावित्री कहती हैं कि उनकी शादी मल्हीपुर में मलंग गांव के रहने वाले छविलाल के साथ हुई थी, लेकिन विदाई नहीं हुई थी।
वे 16 दिसंबर 1995 को लखनऊ में समाज के लिए किए गए एक प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए गई थीं। यहीं फायरिंग में गोली लगी। जिला कारागार में बंद हुई, वहीं इलाज हुआ। जेल से छूटी तो यह संकल्प ले लिया कि अब आजीवन विवाहित जीवन नहीं जीना है। छोटी बहन शादी के योग्य हो गई थी उसकी शादी उसी छविलाल से करवा दी, जिसके साथ खुद सावित्री बाई फुले का बाल विवाह हुआ था। इसके बाद फिर सावित्री बाई फुले ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2001, 2005 और 2010 में वह अलग-अलग क्षेत्रों से जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतती रहीं। भाजपा के टिकट पर विधानसभा के तीन चुनाव सावित्री बाई फुले ने लड़े। वर्ष 2002 और 2007 का चुनाव मामूली अंतर से पराजित हो गई, लेकिन 2012 में उन्होंने बलहा सुरक्षित क्षेत्र से जीत का परचम फहरा दिया। उनका सियासी सफर जितना रपटीला रहा है, उससे कहीं ज्यादा उनकी पारिवारिक झंझावतें उन्हें उलझाती रहीं हैं। इस तेज-तर्रार महिला ने तराई में अपनी छवि संघर्षशील युवा नेत्री जैसी बनाई है।
भारतीय महिला सखी उत्थान समिति के नाम से एक संगठन खड़ा कर सावित्री ने 90 हजार से अधिक महिलाओं को सीधे तौर पर खुद से जोड़ रखा है। वह कहती हैं कि महिलाओं के साथ बढ़ती घटनाएं तभी रुकेंगी जब समाज की महिला खुद मुखर होकर आगे बढ़ेंगी और उत्पीड़न का जवाब देने को तैयार होंगी। वह कहती हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण मिलना चाहिए।