“एनिमल हाउस बना पर्यावरणीय प्रयोगशाला: कुलगुरु ने सराहा प्राणी विज्ञान विभाग का प्रयास”

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर

अजमेर।  महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर  के कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल ने आज विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग द्वारा स्थापित एनिमल हाउस का निरीक्षण किया। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो सुभाष चन्द्र सहित विभाग के शोध छात्र एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

निरीक्षण के दौरान कुलगुरु महोदय को एनिमल हाउस में संचालित विभिन्न गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रो. सुभाष चंद्र ने उन्हें विशेष रूप से प्राकृतिक रूप से तैयार की जाने वाली खाद (ऑर्गेनिक मैन्योर) की प्रक्रिया का अवलोकन कराया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार जैविक अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग कर पर्यावरण के अनुकूल खाद तैयार की जा रही है, जो न केवल भूमि की उर्वरता बढ़ाती है बल्कि रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों को भी कम करती है।

इसके साथ ही कुलगुरु महोदय ने वर्मी कम्पोस्ट के लिए तैयार किए गए बेड का भी निरीक्षण किया। उन्होंने इस प्रक्रिया को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि वर्मी कम्पोस्टिंग न केवल अपशिष्ट प्रबंधन का एक प्रभावी तरीका है, बल्कि यह सतत कृषि (Sustainable Agriculture) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।

एनिमल हाउस के समग्र अवलोकन के पश्चात कुलगुरु प्रो. अग्रवाल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में पर्यावरण संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्य जिम्मेदारी है। उन्होंने प्राकृतिक खाद एवं वर्मी कम्पोस्ट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारते हैं, बल्कि जल संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन तथा प्रदूषण नियंत्रण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे इन वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय तकनीकों को केवल प्रयोगशाला तक सीमित न रखें, बल्कि समाज में भी इसके प्रति जागरूकता फैलाएं। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल शैक्षणिक ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को सामाजिक एवं पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के प्रति सजग बनाना भी है।

कुलगुरु महोदय ने प्राणी विज्ञान विभाग के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की पहलें विद्यार्थियों को व्यवहारिक ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। साथ ही उन्होंने विभाग को भविष्य में भी ऐसे नवाचारपूर्ण कार्यों को जारी रखने हेतु प्रोत्साहित किया।

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