पूर्व मुख्यमंत्री,
राजस्थान।
विषयः- प्रदेश की सहकारी संस्थाओं में लोकतंत्र की हत्या कर थोपे गए ‘प्रशासक राज’ के विरुद्ध वर्तमान भाजपा सरकार की घेराबंदी करने एवं सहकारिता आंदोलन को पतन से बचाने के संदर्भ में महत्वपूर्ण ज्ञापन।
आदरणीय महोदय,
अत्यंत व्यथित हृदय और भारी आक्रोश के साथ आपको अवगत करवाना पड़ रहा है कि वर्तमान भाजपा सरकार की किसान-विरोधी नीतियों के कारण प्रदेश में सहकारिता अनाथ हो गई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुख्य जीवन रेखा मृतप्रायः हो गई है। सहकारिता में प्रजातांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और सत्ता के अहंकार में सहकारी संस्थाओं में माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की भी खुलेआम अवहेलना हो रही है। यदि इस संकट की घड़ी में सहकारिता में समय पर चरणबद्ध चुनाव हो गए तो इसे पुनः संजीवनी मिल जाएगी और वर्तमान सरकार को बैकफुट पर लाया जा सकेगा।
महोदय, यह आंदोलन कांग्रेस की ऐतिहासिक धरोहर रहा है। भारत के महापुरुषों पं. जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई और महात्मा गांधी जी की प्रेरणा से ब्रिटिश हुकूमत के कार्यकाल के दौरान 1910 में सहकारिता का जन्म हुआ था। तत्कालीन साहूकार ऋण व्यवस्था को समाप्त करने और किसानों का हो रहा भारी शोषण रोकने के लिए इस आंदोलन को स्थापित किया गया था। राजस्थान में भी सर्वप्रथम अजमेर जिले में पीसांगन एवं रामगढ़ आदि ग्रामों में कृषि ऋण दात्री सहकारी समितियों का गठन कर कार्य प्रारम्भ किया गया था। धीरे-धीरे राजपूताना के अन्य हिस्सों में भी सहकारिता का प्रसार हुआ और आजादी के बाद भारतवर्ष में पूर्ण यौवन पर सहकारिता आंदोलन स्थापित हो गया।
सर्वप्रथम राज्य सरकार ने ‘राजस्थान सहकारिता संस्था अधिनियम 1965’ की संरचना करके प्रदेश में लागू किया, जिसके अंतर्गत प्रदेश के अधिकांश जिलों में स्थानीय स्तर पर मार्केटिंग सोसाइटीज (Marketing societies), केंद्रीय सहकारी बैंक, भूमि विकास बैंक, क्रय-विक्रय, बुनकर संघ, साख सहकारी समिति, कर्मचारी अल्प बचत सहकारी संघ आदि 34 प्रकार की सहकारी संस्थाओं का गठन किया गया। आगे चलकर बड़े शहरों में महिला सहकारी बैंकों की भी स्थापना की गई। इस प्रकार सहकारी संस्थाएं ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों, पशुपालकों, सीमान्त किसानों, भूमिहीन किसानों एवं ग्रामीण क्षेत्र के मजदूरों की जीवन रेखा बन गईं।
परन्तु अन्य प्रदेशों की तुलना में राजस्थान का सहकारी संस्था अधिनियम सशक्त नहीं बन पाया था, जबकि दूसरी ओर गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि में यह सशक्त रूप से प्रभावकारी हो गया था। इसी से प्रेरणा लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में आपने सहकारिता को देश में सर्वोच्च शिखर पर ले जाने हेतु श्रीमती कमला बेनीवाल, परसराम मदेरणा, पूनमचंद विश्नोई, चंदनमल वैद्य, रामलाल जाट एवं मांगीलाल डांगा आदि सहकारी क्षेत्र के विशेषज्ञों की कमेटी गठित की और इन्हें देश के अन्य राज्यों का अध्ययन कर नया राजस्थान सहकारिता संस्था अधिनियम, नियम एवं उपनियम बनाने का कार्यभार सौंपा गया।
इन्होंने कड़ी मेहनत करके देश को पहला आदर्श ‘राजस्थान सहकारी संस्था अधिनियम 2002’, ‘नियम 2003’ एवं ‘अधिनियम 2005’ का प्रस्ताव देश में सर्वोच्च स्तर का तैयार कर प्रस्तुत किया, जिसे आपकी राज्य मंत्रिमंडल ने स्वीकार कर विधानसभा (गहलोत सरकार के) द्वारा पुष्टि की गई। देश के इस सर्वोत्तम अधिनियम ने सर्वोच्च स्तर के आदर्श स्थापित किए, जो आज पंगु हो गए हैं। इन्हीं नए नियमों के अंतर्गत सहकारी बैंक, भूमि विकास बैंक, जिला दुग्ध संघ, क्रय- विक्रय सहकारी समितियां आदि समस्त संस्थाओं के चुनाव करवाए गए एवं उन्हें स्वायत्तता प्रदान करते हुए पूर्ण प्रजातांत्रिक अधिकार प्रदान किए गए।
परन्तु अत्यंत खेद का विषय है कि जब-जब भाजपा का शासन प्रदेश में आया, तब-तब सहकार आंदोलन को कमजोर किया गया और राजनैतिक द्वेषतावश अधिकांश संस्थाओं के संचालक मंडलों को भंग कर प्रशासक नियुक्त किए गए। इससे इन संस्थाओं की स्वायत्तता एवं प्रजातांत्रिक प्रणाली धीमी पड़ गईएवं उनका कार्यक्षेत्र भी कमजोर होने लग गया। समय-समय पर सहकारिता क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को समय पर चुनाव करवाने हेतु माननीय उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
वर्ष 2015 में भी जब प्रदेश और देश में भाजपा का शासन चल रहा था, तब वर्ष 2015 के बाद मात्र जिला दुग्ध संघों के चुनाव ही समय पर संपन्न हुए। इसके पश्चात आज तक 34 प्रकार की विभिन्न सहकारी संस्थाओं के चुनाव आज तक नहीं हुए क्योंकि यह सरकारें पूंजीपतियों एवं धन्ना सेठों की समर्थक रही हैं, अतः इन्होंने सहकारिता को अनाथ बना के छोड़ दिया है। यदि समय पर चुनाव होते तो महाराष्ट्र, गुजरात एवं कर्नाटक की भांति हमारी 34 हजार सहकारी संस्थाएं भी फलती-फूलतीं।
इसी दौरान जब राज्य सरकार ने संचालक मंडल भंग कर प्रशासक नियुक्त करने का क्रम जारी रखा, तो प्रदेश की लगभग 200 सहकारी समितियों के जनप्रतिनिधियों ने माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर की शरण ली एवं माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश जारी किया कि किसी भी सहकारी संस्था के चुनाव समय पर करवाए जाएं, तब तक संचालक मंडल भंग नहीं किए जाएं, न ही प्रशासक लगाया जाए।
इसी क्रम में इस वर्ष जनवरी, फरवरी, मार्च में प्रदेश की 13,000 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों के चुनाव की सीमा तय थी। इसी प्रकार प्रदेश के 15- 20 जिला दुग्ध संघों के चुनाव की अप्रैल माह में समय सीमा थी। परन्तु राज्य सरकार को बार-बार अनुरोध करने पर भी इन संस्थाओं के चुनाव समय अवधि में नहीं करवाकर, इनके समस्त संचालक मंडलों को भंग कर राज्य सरकार ने प्रशासक लगाना प्रारम्भ कर दिया था।
उपरोक्त संस्थाओं के जनप्रतिनिधियों ने राज्य सरकार की तानाशाही मंशा को जानते हुए अजमेर, बीकानेर, चूरू, गंगानगर, नागौर, जोधपुर, जैसलमेर, रानीवाड़ा, बाड़मेर, पाली आदि 10 जिला संघों के संचालक मंडलों ने संबंधित माननीय उच्च न्यायालय में जयपुर एवं जोधपुर में वाद दायर करके स्थगन (Stay) आदेश प्राप्त कर लिया। परन्तु राज्य सरकार ने हठधर्मिता दिखाते हुए रानीवाड़ा जिला दुग्ध संघ के संचालक मंडल को माननीय उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश होने के बावजूद भंग (Board भंग) कर दिया, जिसकी आज माननीय उच्च न्यायालय जोधपुर में पुनः सुनवाई हो रही है।
इसके साथ ही, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी 10 अप्रैल को अपना निर्णय सुनाया था कि जिला दुग्ध संघों में चुनाव के समय संघ के उपनियमों की पालना की जाए।परन्तु राज्य सरकार की मंशा इसे लागू करने के लिए अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है, क्योंकि इसकी पालना के संबंध में माननीय रजिस्ट्रार महोदय, सहकारी समितियां राजस्थान ने आवश्यक आदेश (Order) जारी नहीं किए हैं। यदि समय पर आदेश जारी नहीं किए गए, तो जनप्रतिनिधियों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय में उनके आदेशों की अवहेलना के संबंध में वाद दायर करना होगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी।
महोदय, यह बेहद चिंताजनक है कि आपके कुशल नेतृत्व में वर्ष 2023 में राजस्थान श्वेत क्रांति (दूध उत्पादन) में प्रथम स्थान पर था, जो आज इस सरकार की अव्यवस्था के कारण पूरे देश में द्वितीय स्थान पर चल रहा है। यदि यही व्यवस्था रही तो हम तीसरे स्थान पर जा सकते हैं।
यदि श्वेत क्रांति की सहकारी संस्थाओं के चुनाव राज्य सरकार ने समय पर नहीं करवाए तो श्वेत क्रांति से संबंधित सदस्यों का आंदोलन आगामी माह जून में विशाल पैमाने पर किया जाएगा, जिसकी समस्त जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। यह मुद्दा वर्तमान भाजपा सरकार की तानाशाही को बेनकाब करने के लिए एक अचूक हथियार है।
हमें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के दबाव और आपके मार्गदर्शन से राज्य सरकार इन संस्थाओं के चुनाव शीघ्रता-शीघ्र करवाएगी, जिससे कि इन संस्थाओं में प्रजातांत्रिक प्रणाली की नई ऊर्जा का संचार होगा एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा सशक्त और मजबूत बनेगी।