सेवा के भाव से कितने आते हैं दरगाह कमेटी में?

प्रो. सोहल अहमद की सदारत वाली दरगाह कमेटी का कार्यकाल पूरा होते ही एक ओर जहां नए सदस्यों के लिए भाग दौड़ तेज हो गई है, वहीं मुस्लिम एकता मंच ने कमेटी में राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्तियों पर रोक लगाने व स्वच्छ छवि के ईमानदार लोगों को शामिल करने की मांग कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से करके एक नई बहस को जन्म दिया है।
हालांकि मंच के कर्ताधर्ता शेखजादा जुल्फिकार चिश्ती व मुजफ्फर भारती की मांग तार्किक दृष्टि से सही है, मगर सच्चाई यही है कि नियुक्ति राजनीतिक आधार पर ही होती है। कांग्रेस राज में कांग्रेसी विचारधारा वाले और भाजपा राज में भाजपा पृष्ठभूमि के लोगों को तरजीह दी जाती है। अलबत्ता उनकी इस मांग में दम है कि ऐसी साफ सुथरी छवि के लोगों का मनोनयन किया जाना चाहिये, जो हर नजरिये से जायरीने ख्वाजा की खिदमत का जज्बा रखते हों, मगर धरातल का सच ये ही है कि कुछ ले दे कर अथवा सिफारिश से सदस्य बनने वाले जायरीन की सेवा की बजाय कमेटी के संसाधनों का उपयोग ही ज्यादा करते हैं। विशेष रूप से दरगाह गेस्ट हाउस का अपने जान-पहचान वालों के लिए उपयोग करने के तो अनेक मामले उजागर हो चुके हैं।
यद्यपि चिश्ती व भारती कांग्रेस पृष्ठभूमि के हैं, मगर उन्होंने बेकाकी से स्वीकार किया है कि मुगलकाल से ब्रिटिश शासन और आजाद भारत के शुरुआती सालों में दरगाह का प्रबंध इस्लामिक विद्धानों, धर्म प्रमुखों, सूफीज्म से जुड़े लोगों द्वारा किया जाता रहा है, मगर 1991 में केन्द्र की कांग्रेसनीत सरकार के सामाजिक न्याय मंत्री सीताराम केसरी ने सांसद तारिक अनवर तथा सैयद शहाबुद्दीन को नियुक्त कर मुसलमानों के इस धर्म स्थल को सियासी कार्यकर्ताओं के हाथों में सौंपने की बुनियाद डाल दी। बाद में 2003 में भाजपा शासित केन्द्र सरकार ने भी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को ही शामिल किया। दुर्भाग्य से इस कमेटी का पूरा कार्यकाल विवादास्पद रहा। दरगाह के इतिहास में पहली बार कमेटी को भंग करने के लिये एक सामाजिक संस्था हम आपके ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की। इस पर 24 अगस्त 2007 को केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्री ए. आर. अंतुले ने तत्कालीन दरगाह कमेटी को कुप्रबंधन के लिये जिम्मेदार मानते हुए भंग कर दिया। मगर किया ये कि कांग्रेस व सहयोगी दलों के ही कार्यकर्ताओं को भर दिया, जिनके खाते में दरगाह की सम्पत्तियों में कुप्रबंधन, दरगाह गेस्ट हाउस व वाहन का दुरुपयोग कर लाखों रुपए का नुकसान दर्ज हो गया। ऐसे में मंच की यह मांग जायज ही है कि कमेटी में स्वच्छ छवि के लोगों की नियुक्ति होनी चाहिए, ताकि दुनियाभर में मशहूर दरगाह के साथ भ्रष्टाचार के किस्से न जुड़ें।
हालांकि निवर्तमान कमेटी विवादास्पद रही है, फिर भी सोहेल अहमद की सदारत में कायड़ विश्राम स्थली कमेटी को सौंपे जाने, आस्ताना शरीफ में नया गेट निकालने सहित पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के 5 करोड़ 47 लाख 48 हजार 905 रुपये के नजराने में से एक करोड़ 46 लाख रुपए हासिल करने और दरगाह गेस्ट हाउस में रेलवे आरक्षण काउंटर की शुरुआत करने की उपलब्धियां कमेटी के खाते में दर्ज हैं।
प्रसंगवश बता दें कि दरगाह कमेटी भारत सरकार के अधीन एक संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन संसद द्वारा पारित दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम 1955 के तहत किया जाता है। निवर्तमान कमेटी का कार्यकाल गत 24 अगस्त को समाप्त हो गया। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलात मंत्रालय नई कमेटी के लिए गजट नोटिफिकेशन जारी करेगा। जैसी कि जानकारी है राजस्थान के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल व मध्यप्रदेश आदि राज्यों के अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता, शिक्षाविद् आदि कमेटी सदस्य बनने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। यहां तक कि निवर्तमान कमेटी के सदस्य भी दुबारा मौका हासिल करने की जुगत कर रहे हैं। अब देखना ये है कि क्या मुस्लिम एकता मंच की शिकायत पर गौर करके अच्छे लोगों को नियुक्त किया जाता है, या फिर वही ढर्ऱे के मुताबिक कमेटी के संसाधनों का दुरुपयोग करने वाले ही काबिज होते हैं।
-तेजवानी गिरधर

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