सांस्कृतिक विरासत के वारिस बी. एल. सामरा

आज आपकी मुलाकात करवा रहे हैं अजमेर शहर की एक मशहूर शख्सियत श्री बी. एल. सामरा से, जो भारतीय जीवन बीमा निगम के अजमेर मंडल कार्यालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से 31 जुलाई 2019 को सेवानिवृत्त हुए हैं। वे अपने विद्यार्थी जीवन से ही सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे और एक साप्ताहिक और एक पाक्षिक समाचार पत्र का संपादन किया। रचनात्मक लेखन और राजभाषा हिंदी से गहरा लगाव रखने वाले श्री सामरा पत्रकारिता एवं साहित्य क्षेत्र में सुरेंद्र नीलम के नाम से पहचान रखते हैं और अपनी एक विशिष्ट अभिरुचि के कारण अपने कार्य क्षेत्र में मिली व्यापक शोहरत के कारण आज किसी पहचान के मोहताज नहीं है। वे पिछले 50 वर्ष से हमारी सांस्कृतिक धरोहर से संबंधित सामग्री का संकलन कर रहे हैं।
राजस्थान के मेवाड़ अंचल में राजसमंद जिले के एक छोटे से गांव आसन ठीकरवास में 8 जून 1958 को एक सामान्य वणिक परिवार में जन्मे श्री सामरा 11 वर्ष की आयु में जब छठी कक्षा के विद्यार्थी थे, तभी परिवार में घटी एक छोटी सी घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल कर रख दी तथा जीवन का मकसद और मिशन तय कर दिया। हुआ यह था कि इनके दादा जी ने जो मेवाड़ की रियासत में कामदार थे, उन्हें तांबे का एक पुराना पैसा दिया, जिसको अपनी बाल सुलभ बुद्धि से उन्होंने अनुपयोगी मान कर फेंक दिया। उनके दादा जो यह सब देख रहे थे, उन्होंने प्यार भरी डांट लगाते हुए इन्हें अपने पास बुलाया और पूछा कि पैसे को क्यों फेंक दिया, इस पर उन्होंने जवाब दिया कि यह पैसा पुराना और खोटा है, तो दादा ने उनके सिर पर हाथ फेरकर नसीहत देते हुए कहा – बेटे, पैसा पुराना हो गया तो क्या हुआ, मगर पैसा लक्ष्मी का रूप होता है और उसको फेंक कर उसकी बेकद्री नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया में ईश्वर ने ऐसी कोई चीज नहीं बनाई है, जो फिजूल और फालतू है। कुदरत ने जो कुछ भी इस दुनिया में बनाया है, उस सबकी अपनी उपयोगिता है। भले ही हम नहीं जानते, मगर धरती का एक- एक कण और वनस्पति का एक तिनका भी औषधि हो सकता है। अगर हम हिफाजत करें तो एक कौड़ी की चीज भी करोड़ की बन सकती है और हिफाजत नहीं करें तो करोड़ की चीज भी कौड़ी की बन जाती है । कचरा और कूड़ा समझी जाने वाली सामग्री भी हमारी विरासत और धरोहर का हिस्सा हो सकती है। दादा जी की डांट भरी नसीहत ने श्री सामरा के जीवन का मकसद निर्धारित कर दिया और उन्होंने इसे जुनून के साथ अपने शौक और अभिरुचि सहित अपना मिशन बना दिया और पिछले 50 वर्ष से हमारी सांस्कृतिक धरोहर से संबंधित सामग्री का संचय करने में जी जान से जुटे हुए हैं। आज इनके संग्रह में सैकड़ों पांडुलिपियां, स्टैंप पेपर, पोस्ट कार्ड व विविध डाक सामग्री और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी प्रत्येक वह सामग्री, जिससे हमारी बुजुर्गों की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर की झलक मिलती है, उसका संग्रह करने में जी जान से जुटे हुए है। आज उनके संग्रह में सैकड़ों घडिय़ां, ताले, हस्तलिखित पांडुलिपियां, बेहतरीन किताबें, सिक्के, डाक टिकट, पोस्टकार्ड, स्टैंप पेपर तथा हमारे बुजुर्गों की कला साधना के विविध नमूने, रियासतकालीन राजकीय पत्र व्यवहार, जन्म कुंडलियां, जो 20 -25 फीट लंबी हैं, कलम दवात, लेखन सामग्री, पेन स्टैंड, लेम्प स्टैंड, इत्र की खूबसूरत बोतलें, इत्रदान, फूलदान आदि सैकड़ों वस्तुओं के बेहतरीन नमूनों का नायाब खजाना है।
श्री सामरा के पास हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि समुदायों के प्राचीन धर्म ग्रंथ मौजूद हैं, जिसमें सवा सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित कई तरह की बाइबल व क्रिसमस कार्ड तथा नव वर्ष से संबंधित शुभकामना वाले ग्रीटिंग कार्ड का संग्रह मौजूद हैं।
उनकी श्रमसाधना, इच्छाशक्ति और संकल्पयुक्त जीवन यात्रा आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्पद है। श्री सामरा विरासत के वारिस बन कर उसकी हिफाजत के लिए जुटे हुए हैं। उनके इस जज्बे और जुनून को सलाम।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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