काम के आधार पर वोट देता कौन है?

कुछ लोग यह मुद्दा उठा रहे हैं कि मौजूदा भाजपा सांसद भागीरथ चौधरी को चुनाव प्रचार के दौरान अपनी उपलब्धियां गिनानी होंगी। बात सैद्धांतिक रूप से ठीक प्रतीत होती है, मगर अनुभव बताता है कि लोकसभा चुनाव में काम के आधार पर वोट नहीं पडता है। आप देखिए, भूतपूर्व सांसद स्वर्गीय श्री रासासिंह रावत के खाते में कुछ खास उपलब्धियां नहीं रहीं, इसके बावजूद वे अकेले जातीय समीकरण के दम पर पांच बार चुनाव जीते। दूसरी ओर एक बार सांसद बन कर कई विकास कार्य करवाने के बाद सचिन पायलट को उम्मीद थी कि लोग उनको दुबारा जिताएंगे, मगर सब कुछ धरा रह गया। मोदी के चक्रवात में सब कुछ बह गया और वे हार गए। असल में लोकसभा चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है पार्टी, उसके बाद जातीय समीकरण प्रभावी होता है। प्रत्याषी की छवि का भी अपना प्रभाव होता होगा, मगर बहुत कम। इसका अपवाद भी है। जिन स्वर्गीय श्री सांवरलाल जाट ने सचिन पायलट को हराया था, उनके ही पुत्र रामस्वरूप लांबा को उसी जातीय समीकरण के तहत मैदान में उतारा गया, मगर डॉ रघु षर्मा से हार गए। असल में उनका व्यक्तित्व प्रभावषाली नहीं था। वैसे षर्मा की जीत में ब्राह्मण जाति के एक जुट हो जाने को माना गया। यानि कि जाति और जातीय समीकरण ने काम किया।

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