कौतुहल पैदा करती है कोस मीनार

आपने अजमेर जयपुर मार्ग सडक के किनारे मीनारें देखी होंगी। उन्हें कोस मीनार कहा जाता है। कोस मीनार ईंट या पत्थर से बनी बेलनाकार संरचनाएं होती हैं। यह मुगलकालीन भारत की एक ऐतिहासिक संरचना है, जिसे मुख्य रूप से सड़कों के किनारे दूरी मापने के लिए बनाया गया था। ये मीनारें अकबर के शासनकाल 1556-1605 में बनाई गई थीं और बाद में जहांगीर और शाहजहां ने भी इस परंपरा को जारी रखा। ज्ञातव्य है कि अजमेर मुगल साम्राज्य के समय एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और धार्मिक केंद्र था और यहां से होकर मुगल राजमार्ग से गुजरते थे। इसलिए अजमेर और इसके आसपास भी कोस मीनारें स्थापित की गई थीं, जो उस समय के यात्रा मार्गों पर दूरी दर्शाने का साधन थीं। इनकी दूरी एक कोस यानि लगभग 3 किलोमीटर या 2 मील होती थी। इनकी ऊंचाई करीब 30-40 फीट होती है। इन्हें सड़क के किनारे हर एक कोस पर खड़ा किया जाता था। ये मीनारें यात्रियों, संदेशवाहकों और सैनिकों के लिए दिशा और दूरी बताने का कार्य करती थीं। अजमेर से निकलने वाले पुराने दिल्ली-अजमेर-माउण्ट आबू मार्ग या अजमेर-आगरा मार्ग पर कोस मीनारें देखी जा सकती हैं।
कुछ मीनारें अब भी राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे या गांवों के पास स्थित हैं, हालांकि कई अब नष्ट हो चुकी हैं या नजरअंदाज कर दी गई हैं। इन्हें संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। कोस मीनार व उसके पास लगे नोटिस बोर्ड की फोटो जलदाय विभाग के रिटायर्ड एडीशनल चीफ इंजीनियर व जाने-माने बुद्धिजीवी श्री अनिल जैन ने अपने फेसबुक अकाउंट पर साझा की है।

Leave a Comment

This site is protected by reCAPTCHA and the Google Privacy Policy and Terms of Service apply.

error: Content is protected !!