
क्या ‘हिंदू विरोधी’ छवि कांग्रेस के पतन का कारण बनी,क्या लोकसभा चुनावों में इसी के कारण हिन्दू वोटरों का ध्रुवी करन बी.जे.पी. के पक्ष में हुआ?
लोकसभा चुनावों में अप्रत्याक्षित हार के बाद विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी कांग्रेस के लिए अत्यन्तं निराशाजनक ही—- रहे हैं —-क्या हो सकते हैं इसके कारण ?
मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार पार्टी अपनी ‘बिगड़ती छवि’ पर चिंतन करने हेतु बाध्य हो गई दिखाई पड़ती है. वहीं बहुत से अग्रिम पार्टी नेताओं एवं समालोचकों के मतानुसार चुनावों में निरंतर पराजय की प्रुमख वजहों में से एक वजह– भारत के बहूसंख्यक हिन्दू समाज के भीतर उसकी तथाकथित “हिन्दू-विरोधी छवी” को बताया जा रहा है | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है की पूर्व मे भी कांग्रेस पर हिन्दू-विरोधी होने के आरोप लगते हैं, किन्तु इस बार इस बात का कांग्रेस के विरोधियों ने इसका सर्वाधिक फायदा उठाया लगता है |लेकिन पार्टी की लोकप्रियता में कमी के कारण शायद कुछ और भी हैं, जिन पर दल आत्म चिन्तन नहीं कर रहा दिखता है या आत्म चिन्तन करने से कतरा रहा है |
सवाल यह भी है कि क्याकांग्रेस वास्तव में अपनी बिगड़ती छवि से परेशान है? या इस बात से कि उसकी छवि बिगाड़कर ‘हिंदू विरोधी’ बताने की कोशिश की जा रही हैं?
इससे भी बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या कांग्रेस के शीर्षत नेतागण पार्टी की बदहाली के कारणों को समझना भी चाहते हैं या नहीं?
छवि वाली बात कांग्रेस के आत्ममंथन से निकली है | पर क्या आज की कमजोर कांग्रेस स्वस्थ आत्ममंथन करने की स्थिति में है? कहा जाता है कि कभीकभार आंतरिक रूप से कमज़ोर संगठन का आत्ममंथन उसके संकट को ज्यादा बढ़ा भी सकता है.
अस्वस्थ पार्टी स्वस्थ आत्ममंथन नहीं कर सकती. कांग्रेस लम्बे अरसे से इसकी आदी भी नहीं है. कुछ समालोचक इसे पार्टी की प्रचार मशीनरी की विफलता भी मानते हैं और यह भी मानते हैं कि पार्टी राजनीति की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ में भी फेल हो रही है.
कांग्रेस पार्टी पर हिन्दू विरोधी आरोप नया नहीं है, इस पर ऐसे आरोप पचास के दशक से ही लग रहें हैं—–
पचास के दशक में जब हिंदू कोड बिल पास हुआ था, तब ही से पार्टी पर हिंदू विरोधी होने के आरोप लगाता था, पर कांग्रेस की लोकप्रियता में उस वक्त कोई कमी नहीं आई थी |
साठ के दशक का गो हत्या विरोधी आंदोलन भी कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने में असफल ही रहा था |
वस्तुतः आज के पार्टी सकंट को कांग्रेस के नेतृत्व, संगठन और विचारधारा के संकट के रूप में देखा जाना वांछनीय होगा | एक मोर्चे पर विफल रहने के कारण पार्टी दूसरे मोर्चे पर भी आसानी से घिरते चली गई |
कांग्रेस की रणनीति–जैसे पार्टी कहती है की उसकी निती सांप्रदायिकता विरोध और धर्मनिरपेक्षता की है, तो यह कहना होगा कि वह उसे वर्तमान समय मे साबित करने में विफल ही रही है.
आत्ममंथन में जोखिम
अब पार्टी आत्ममंथन के दौर से गुज़र रही है. यह उसकी सबसे बड़ी परीक्षा का समय है. सवाल है कि क्या आत्ममंथन उसके स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होगा या नुक़सानदेह होगा?
आत्ममंथन एक खुली और लम्बी प्रक्रिया है, इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल होंगे. इसलिए पार्टी नेतृत्व को असमंजस में डालने वाले कई मौक़े भी आएंगे या आ सकते हैं |प्रक्रिया पारदर्शी रही तो स्वस्थ निष्कर्ष भी निकलेंगे, जिनसे पार्टी का ही भला होगा एवं पार्टी वापस शक्तिशाली बन कर उभरेगी | सच भी है कि बिना जोखिम उठायें सफलताएँ नहीं प्राप्त होती है |
किन्तु अचानक इस ख़बर का फैलना कि पार्टी ‘हिंदू विरोधी’ छवि से परेशान है, मन में यह संदेह पैदा करता है कि क्या यह सब उसके प्रतिस्पर्धियों के प्रचार का हिस्सा तो नहीं है ( कुछ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है कि पार्टी ने ऐसी कोई बात की है ) | कांग्रेसपार्टी ने औपचारिक रूप से अपनी छवि को लेकर या आत्ममंथन के निष्कर्षों को लेकर कुछ कहा भी तो नहीं है |
पिछले साल दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी आम आदमी पार्टी की रीति-नीति से प्रभावित हुए थे. पर इतना समय बीत जाने के बाद भी लगता नहीं कि पार्टी नेतृत्व कार्यकर्ताओं से जुड़ा हुआ है या जुड़ने का गम्भीर प्रयास कर रहा है |
एंटनी की चेतावनी
जून 2014में पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ और अल्पसंख्यकों के प्रति झुकाव रखने वाली छवि सुधारनी होगी | उनके बयान से लहरें उठी थीं खलबली भी मची थी किन्तु बात वहीं की वहीं पर रही, कोई रचनात्मक उपाय नही किये गये
मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी की आंतरिक बैठकों में यह मसला कई बार उठा भी है, इसलिए अब पार्टी निचले स्तर के कार्यकर्ता की राय लेना चाहती है |
राहुल गांधी ने सहज भाव से पार्टी महासचिवों से कहा है कि वे निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की राय लें कि पार्टी को कैसे आगे ले जाया जा सकता है |
‘हिंदू विरोधी’ छवि पार्टी की चिंता का विषय है या विरोधियों के प्रचार का हिस्सा है? विरोधी तो छवि बिगाड़ना ही चाहेंगे, पर क्या पार्टी-कार्यकर्ता की राय भी यही है?
अतिशय भाजपा-विरोध-
कांग्रेस पार्टी की भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी साबित करने के अतिशय उत्साह की वजह से तो कहीं यह स्थिति पैदा नहीं हुई हैं ?
अतिशय भाजपा विरोध की शुरुआत गुजरात से हुई थी. नरेंद्र मोदी को पराजित करने की ज़िम्मेदारी जिन पर थी उनके पास 2002 दंगों के बाद बनी मोदी की छवि का कार्ड था | तथा कथित हिन्दू/ बहूसंख्यक विरोधी निती की पहली पराजय गुजरात में हुई जहाँ भाजपा ने अपने चातुर्य-कर्मठ कार्यकर्ताओं की फोज से इसका पूरा लाभ उठाया और बहुत से कांग्रेसी विचार धारा वालों ने भी भाजपा को जिताने में मदद की | क्या वह सांप्रदायिकता की जीत थी या हिन्दू विरोधी निती का परिणाम था ?
2007 के चुनाव में जैसे ही सोनिया गांधी ने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा, भाजपा एवं मोदी ने उसे गुजरात की अस्मिता से जोड़ दिया और कांग्रेस का भाजपा को घेरने का दावं खुद कांग्रेस की पराजय का कारण बना | कांग्रेस तब भी मोदीजी के वाक्-चातुर्य का जबाव नहीं दे पायी | इसके विपरीत कांग्रेस ने जब जब धर्म निरपेक्षता एवं अल्पसंख्यकों के संरक्षण से जुड़े क़दम उठाए, भाजपा उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने में कामयाब रही | भाजपा हिन्दुओं के मतों के धुर्वीकरण करने में कामयाब होती गई |
क्या पार्टी अल्पसंख्यकों के हितों को समझ पाई? क्या अल्पसंख्यक कांग्रेस के साथ हैं?
लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सोनिया गांधी का जामा मस्जिद के इमाम से भेंट करने का कोई फ़ायदा नहीं मिला, अल्पसंख्यक वोट तो विभाजित हो गये किन्तु सभी वर्गों के अधिकांक्ष हिन्दू कांग्रेस से नाराज हो गये और कांग्रेस को उल्टा नुक़सान हो गया |
दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी बांग्लादेशियों के अवैध आगमन और सांप्रदायिक हिंसा बिल जैसे क़ानूनों का मुद्दा उठाते रहे. कांग्रेस के पास इनके जवाब में कोई कारगर रणनीति नहीं थी और नहीं कोई दमदार वक्ता |अंततः यह विधेयक भी ठंडे बस्ते में चला गया | इसके विपरीत भाजपा ने कांग्रेस को धर्मांतरण विरोधी क़ानून के मसले में उलझा दिया है |पंद्रहवीं लोकसभा के अंतिम सत्र में यूपीए सरकार ने सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा अधिनियम 2011 को पास कराने की कोशिश की तो भाजपा ने उसे बहुसंख्यकों के ख़िलाफ़ साबित किया|
भारत की प्राचीनतम पार्टी को खुल्ले दिल से अपनी कमजोरियों, नितीयों, कार्यक्रमों पर आत्मचिन्तन करना होगा, कांग्रेस को वापस जन-जन की पार्टी बनाना होगा समाज के सभी वर्गों को चाहे वें हिन्दू हों, मुसलमान, सिक्ख,इसाई, फ़ारसी ,जैन, बोध, दलित हों, इन सभी को साथ चलना होगा | चुनावों मे हार-जीत स्थाई नहीं होती है, हार को जीत में बदलने के लिये रचनात्मक सोच अपनाकर अपने खोये हुएं जनाधार को वापस प्राप्त करना होगा, यह काम मुश्किल तो हो सकता है किन्तु असंभव नहीं है |
-जे.के. गर्ग