मोदी के सामने खम ठोक कर खड़ी हैं वसुंधरा

-गिरधर तेजवानी-
पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के बीच चल रही नाइत्तफाकी आखिर आगामी विधानसभा चुनाव से सात माह पहले परवान चढ़ गई है। यूं तो कई बार इस आशय की राजनीतिक अफवाहें उड़ीं कि मोदी वसुंधरा को जयपुर से हटा कर दिल्ली शिफ्ट करेंगे, मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। वजह थी वसुंधरा को डिस्टर्ब करना आसान नहीं था। उनकी राजस्थान पर अपनी निजी पकड़ है। अब जब कि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं तो लोकसभा उपचुनाव में करारी हार के बाद स्वाभाविक रूप से भाजपा हाईकमान को यहां नए सिरे से जाजम बिछानी ही है। उसी के तहत प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी को हटाया गया, मगर नया अध्यक्ष कौन हो, इसको लेकर मोदी व वसुंधरा के बीच टकराव की नौबत आ ही गई। हालांकि इस टकराव का क्या अंजाम होगा, यह कहना मुश्किल है, मगर यह सुनिश्चित है कि वसुंधरा इतनी आसानी से हथियार डालने वाली नहीं हैं।

तेजवानी गिरधर
ज्ञातव्य है कि भाजपा हाईकमान से टकराव की हिम्मत वसुंधरा पूर्व में भी दिखा चुकी हैं, मगर तब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। तब भाजपा विपक्ष में होने के कारण कमजोर भी थी। इस कारण वसुंधरा के आगे हाईकमान को झुकना पड़ा। लंबे अरसे तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष किसी को नहीं बनने दिया। चुनावी साल में आखिरकार हाईकमान को मजबूर हो कर उन्हें ही पार्टी की कमान सौंपनी पड़ी। लेकिन जैसे ही मोदी लहर के साथ भाजपा पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ केन्द्र पर काबिज हुई और पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के ही हनुमान अमित शाह को बनाया गया तो हाईकमान का पलड़ा काफी भारी हो गया। ऐसे में वसुंधरा को दिक्कतें आने लगीं। कई बार उन्हें हाईकमान के आगे मनमसोस कर चुप रहना पड़ा। बहुत प्रयासों के बाद भी अपने बेटे दुष्यंत को केन्द्र में मंत्री नहीं बनवा पायीं। मोदी लगातार इसी कोशिश में थे कि वसुंधरा सरंडर कर दें, मगर रजपूती महारानी का विल पॉवर कमजोर नहीं पड़ा।
ताजा विवाद नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर है। वसुंधरा को हाईकमान की ओर सुझाए जा रहे अध्यक्ष मंजूर नहीं हैं। वे अपने ही इशारे पर काम करने वाला अध्यक्ष चाहती हैं। उधर अमित शाह इस फिराक में हैं कि ऐसा अध्यक्ष बनाया जाए, जो केवल हाईकमान के कहने पर चले और वसुंधरा के आभामंडल का शिकार न हो। वस्तुत: भाजपा हाईकमान किसी भी सूरत में राजस्थान पर कब्जा बरकरार रखना चाहता है। वसुंधरा के फ्रंट पर रहते यह संभव नहीं है। वसुंधरा की पार्टी विधायकों व नेताओं पर तो पकड़ है, मगर जनाधार अब खिसक चुका है। उनके ताजा कार्यकाल में जातीय संतुलन भी काफी बिगड़ा है। ऐसे में उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे के जोखिम उठाया नहीं जा सकता। इसके लिए पार्टी को नए सिरे से तानाबाना बुनना होगा। बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटने होंगे। नए जातीय समीकरण बनाने होंगे। उसी के तहत परनामी का इस्तीफा हुआ, मगर नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर गाडी गेर में आ गई। इसका प्रमाण ये है कि हाईकमान को नया अध्यक्ष घोषित करने में देरी हो रही है। अब देखना ये है कि वह वसुंधरा कैसे सैट करता है।
बड़ा सवाल ये भी है कि क्या वसुंधरा को अब हटाने का दुस्साहस हाईकमान में है, वो भी तब जबकि चुनाव नजदीक हैं और लोकसभा उपचुनाव के परिणामों ने साबित कर दिया है कि राजस्थान में एंटी इंकंबेंसी फैक्टर काम कर रहा है। लगता यही है कि वह कोई अतिवादी कदम उठाने की स्थिति में नहीं हैं। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के दोफाड़ होने का अंदेशा है। यह सुविज्ञ है कि पिछली बार जब टकराव हुआ था तो इस आशय की खबरें तक आ चुकी थीं कि हाईकमान नहीं माना तो वे अलग पार्टी खड़ी कर लेंगी। ऐसे में बीच का ही रास्ता अपनाया जाएगा। वसुंधरा भी तभी मानेंगी, जब कि उन्हें विधानसभा चुनाव टिकट वितरण में आनुपातिक रूप से पर्याप्त सीटें मिलेंगी। हो सकता है कि वसुंधरा को अनुमान हो कि आखिरकार उन्हें हाईकमान के आगे झुकना होगा या समझौता करना पड़ेगा, मगर फिर भी वे खम ठोक कर खड़ी हैं। असल में उन्हें इस बात का बड़ा गुमान है कि भाजपा वह पार्टी है, जिसे खड़ा करने में उनकी माताजी स्वर्गीया श्रीमती विजयाराजे सिंधिया का अहम योगदान रहा है। इस नाते वे पार्टी की एक ट्रस्टी हैं और बाद में आगे आए नेता उन्हें पीछे नहीं धकेल सकते। इसके अतिरिक्त उन्होंने राजस्थान भाजपा पर मजबूत पकड़ बना रखी है। बहुत से विधायक उनके व्यक्तिगत अनुयायी हैं। और सबसे बड़ी बात ये कि मोदी व शाह कितने भी पावरफुल व शातिर क्यों न हों, मगर राजनीतिक चालों में वसुंधरा भी कम नहीं हैं। राजनीति उनके खून में है। ऐसी महारानी भला इतनी आसानी से कैसे झुक सकती हैं।

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