क्या अपने ही जाल में फंस गई है भाजपा सरकार?

तेजवानी गिरधर
लोकसभा में स्पष्ट बहुमत और राज्यसभा में जुगाड़ करके भाजपा ने पहले धारा 370 को हटाने जैसा ऐतिहासिक कदम उठाया और फिर चंद दिन बाद ही सीएबी भी पारित करवा लिया। यह भाजपा की अपने एजेंडे को लागू करने की सफलता ही कही जाएगी। इस पर वह अपनी पीठ थपथपा सकती है, मगर जिस प्रकार पूरे देश में माहौल बिगड़ा है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अपने ही जाल में फंस गई है। संसद में तो संख्या बल से कामयाबी अर्जित कर ली, मगर धरातल पर वह दाव उलटा पड़ गया। यानि कि सरकार जनता में अपने कदमों के लिए माहौल तैयार कर पाने में विफल हो गई है।
ऐसी दो बड़ी गलतियां भाजपा सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में भी की थीं। यकायक नोटबंदी तो लागू कर दी, मगर उसके बाद जमीन पर जो हालात पैदा हुए उससे पूरा देश फडफ़ड़ा गया। काला धन बाहर आना तो दूर, उलटे काला धन सफेद हो गया। बाइ प्रोडक्ट के रूप में बेरोजगारी बढ़ गई। यानि कि सरकार ने अपने फैसले से पहले न तो इन्फ्रास्टक्चर तैयार किया और न ही उसके इम्पैक्ट का अनुमान लगाया। दूसरी बड़ी गलती बिना तैयारी के जीएसटी लागू करके की। देश में भारी आर्थिक मंदी के हालात उत्पन्न हो गए। बावजूद इसके भाजपा को जब लगातार दूसरी बार चुनाव में अप्रत्याशित सफलता मिली तो उसके हौसले बढ़ गए। जिस धारा 370 को पिछले सत्तर साल में नहीं हटाया जा सका था, उसे एक झटके में ही हटा दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके लिए खूब वाहवाही लूटी। हालांकि उसका यह कदम आगे चल कर क्या हालात उत्पन्न करेगा, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार सरकार ने सीएबी को संसद में पारित तो करवा लिया, मगर आम जनता में इसका जिस तरह विरोध हो रहा है और बढ़ता ही जा रहा है, उससे भाजपा सकते में है। हालात तब और ज्यादा बेकाबू हो गए, जब गृहमंत्री अमित शाह ने ठोक-ठोक कर कहा कि सीएए के बाद देश में एनआरसी भी लागू की जाएगी। उनके कहने का जो अंदाज रहा, कदाचित उसने ही प्रतिक्रिया को तल्ख किया है। जब स्थिति संभले नहीं संभली तो मोदी को खुद आगे आ कर कहना पड़ा कि एनआरसी शब्द तक पर चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने जोर दे कर तीन बार कहा कि यह झूठ है, यह झूठ है, यह झूठ है। विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए जनता को भ्रमित कर रहा है। गृह मंत्री शाह के लिए तो अजीब स्थिति हो गई। प्रधानमंत्री मोदी ने ही उन्हें झूठा ठहरा दिया। गृह मंत्री क्या राष्ट्रपति का अभिभाषण तक झूठा हो गया, जिसमें उन्होंने सरकार के हवाले से ही कहा था कि एनआरसी लाई जाएगी। इस मुद्दे पर सरकार की बड़ी छीछालेदर हुई है। शाह को भी कहना पड़ा कि मोदी सही कह रहे हैं। उहोंने स्पष्ट किया कि एनआरसी लाई जाएगी, मगर अभी नहीं, अभी तो उस पर चर्चा तक नहीं हुई है।
इस बीच आम जनता में इतना भ्रम फैल गया कि अब उसे दूर करने के लिए भाजपा को न केवल सरकार के स्तर पर, अपितु संगठन के स्तर पर भी बड़े पैमाने पर सफाई देनी पड़ रही है। संगठन की छोटी से छोटी इकाई भी समझाइश में जुट गई है कि सीएए नागरिकता छीनने का नहीं, बल्कि नागरिकता देने का कानून है।
सवाल ये उठता है कि आखिर किस स्तर पर चूक हुई कि विपक्ष को जनता को भ्रमित करने का मौका मिल गया। साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार बैकफुट पर आ गई है। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का यह सवाल वाजिब है कि आपने की ही ऐसी लापरवाही है, वरना क्यों गांव-गांव शहर-शहर आपको सफाई देनी पड़ रही है। ताजा प्रकरण से भी यही साबित होता है कि सरकार ने जमीनी स्तर पर माहौल तैयार किए बिना ही संसद में संख्या बल के दम पर कानून लागू कर दिया। अब तो यह तक कहा जाने लगा है कि इस मामले में कहीं न कहीं विपक्ष भी संसद में विफल रहा है, वरना क्या वजह है कि जो सवाल संसद में उठने चाहिए थे, वे जनता उठा रही है?
इधर कांग्रेस व अन्य गैर भाजपा राज्य सरकारें नए नागरिकता कानून व एनआरसी का विरोध करने लगी हैं। बहस यहां तक पहुंच गई है कि नया नागरिकता कानून केन्द्र सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है, अत: राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने के लिए बाध्य हैं। केन्द्र सरकार चाहे तो लागू न करने वाली राज्य सरकारों को बर्खास्त करने की सिफारिश कर सकती है। कुल मिला कर पूरा देश नागरिकता के मुद्दे पर उबल रहा है। बढ़ती बेरोजगारी, आर्थिक मंदी व महंगाई से ध्यान हट कर पूरा देख नागरिकता की बहस में उलझ गया है। हो सकता है कि इससे आगे चल कर भाजपा आम जनता को और अधिक पोलराइज कर राजनीति लाभ हासिल करने की स्थिति में आ जाए, मगर देश तो डूब रहा है।
इस मसले का दिलचस्प पहलु ये भी है कि अब भाजपा की सहयोगी पार्टियां आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत के हिंदू संबंधी बयान पर सवाल खड़ा कर रही हैं कि यदि संघ सभी भारतीयों को हिंदू मानता है तो उसने नए नागरिकता कानून में मुसलमानों को शरण नहीं देने का समर्थन क्यों किया है? यदि आप पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान से आने वाले मुसलमानों को शरण नहीं देते तो इसका अर्थ ये है कि आप भागवत के दर्शन को नहीं मानते। भागवत की हिंदुत्व पर की गई नई व्याख्या से आप सहमत नहीं हैं।
कुल मिला कर जिस जनता ने मोदी को प्रचंड बहुमत इसलिए दिया था कि वे देश में विकास के नए कीर्तिमान स्थापित करेंगे, वह ठगी सी महसूस कर रही है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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