क्या विकास के मुद्दे को भुना पाएंगे अरविंद केजरीवाल?

दिल्ली का राजनीतिक पारा इन दिनों आसमान छू रहा है। देश की राजधानी होने के कारण पूरा राष्ट्रीय मीडिया पर इसी का हल्ला है। दिल्ली विधानसभा के आसन्न चुनाव को लेकर जहां मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने वजूद को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं भाजपा उनकी जमीन खिसकाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रही है। खासकर सोशल मीडिया पर जबरदस्त जंग चल रही है। ऐसा लग रहा है, मानो यह विधानसभा का चुनाव न हो कर देश का आम चुनाव हो रहा है। हालांकि कांग्रेस का परंपरागत वोट पहले ही आम आदमी पार्टी की ओर खिसक चुका है, मगर कांग्रेस पहले से बेहतर प्रदर्शन करने में लगी हुई है। सीएए व एनआरसी को लेकर शाहीद बाग में चल रहा धरने का चुनाव से सीधा कोई लेना-देना नहीं है, वह केन्द्र की मोदी सरकार के खिलाफ है, मगर इसका भी असर पडऩे से इंकार नहीं किया जा सकता।
वस्तुत: केजरीवाल अपना सारा ध्यान पिछले पांच साल में कराए गए विकास कार्यों पर केन्द्रित किए हुए हैं। इस कारण विवादास्पद राष्ट्रीय मुद्दों को छूने से बच रहे हैं। अपने कार्यकाल में शुरुआती दो-तीन साल जरूर उनके निशाने पर मोदी ही हुआ करते थे, मगर वे समझ गए कि यह तकनीक नुकसान देगी, इस कारण पिछले कुछ समय से मोदी के बारे में व्यक्तिगत टीका टिप्पणी करने से बच रहे हैं। वे जान रहे हैं कि ये मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं और उनका सारा किया धरा बेकार हो जाएगा। इस कारण केवल अपने विकास कार्यों को ही चर्चा में रखना चाह रहे हैं। संयोग से इन्हीं दिनों दिल्ली में शाहीन बाग जैसी ज्वाला धधक रही है। वे चाहे लाख इससे बच रहे हों, मगर मतदाता के बीच धु्रवीकरण का अंडर करंट दौड़ रहा है। इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक शख्स ने बड़ी चतुराई से आगामी आठ फरवरी को भारत-पाकिस्तान होने का ट्वीट कर दिया। गृह मंत्री अमित शाह के भाषण में आई यह बात कि आठ तारीख को वोटिंग मशीन का बटन इतनी जोर से दबाना कि उसका करंट शाहीन बाग तक पहुंचे, का अर्थ समझा जा सकता है। यह भी आसानी से समझ में आ रहा है कि भाजपा इस चुनाव मेें स्थानीय मुद्दों की बजाय राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट लेना चाहती है। स्थानीय मुद्दे उसके पास हैं भी नहीं। स्थानीय मुद्दे चूंकि केजरीवाल के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं, भाजपा मानसिकता के पत्रकार व लेखकों को भी यही संभावना लगती है कि इस बार फिर केजरीवाल जीत सकते हैं। स्वाभाविक रूप से भाजपा इस संभावना को समाप्त करना चाहती है। वह अब भी मोदी ब्रांड और उनकी ओर से उठाए गए राष्ट्रीय कदमों के नाम पर वोट लेना चाहती है। भाजपा की दूसरी बड़ी समस्या ये है कि उसके पास केजरीवाल की टक्कर में स्थानीय विकल्प नहीं है। पिछली बार आखीर में किरण बेदी का पत्ता फेल हो जाने के बाद इस बार उसकी हिम्मत ही नहीं हुई कि किसी चेहरे को केजरीवाल के मुकाबले में खड़ा कर सके। उसकी उम्मीद नैया मोदी की चमक के सहारे ही है।
केजरीवाल को जहां वोटों के सांप्रदायिक धु्रवीकरण से आशंकित हैं, वहीं इस बार कांग्रेस के कुछ बेहतर प्रदर्शन को लेकर चिंतित हैं। कांग्रेस इस बार कितना अर्जित कर पाएगी, कुछ नहीं कहा जा सकता, मगर ये समीकरण सुस्पष्ट है कि यदि कांग्रेस पहले के मुकाबले कुछ बेहतर कर पाई तो उसका नुकसान सीधे सीधे आम आदमी पार्टी को ही होगा। भाजपा के स्थाई वोट बैंक में सेंध तो मार नहीं सकती।
चुनाव का आखिरी दौर आते आते केजरीवाल इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि दिल्ली की जनता स्थानीय मुद्दों पर वोट डाले। उनके समर्थक आम जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस चुनाव में काम के नाम पर वोट आम आदमी पार्टी को दें, आम चुनाव में जचे जो करना। यह प्रयास कितना सफल होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। एयर स्ट्राइक, धारा 370 व राम मंदिर के मुद्दों तक तो यही उम्मीद थी कि उनकी बजाय केजरीवाल के काम का मुद्दा ज्यादा असरकारक रहेगा, मगर जब से देशभर में सीएए व एनआरसी का मुद्दा गरमाया है, वोटों का मिजाज केजरीवाल को परेशान किए हुए है। वे अपने इस दुर्भाग्य को कोस रहे होंगे कि ऐन चुनाव के मौके पर सीएए व एनआरसी गले की फांसी बन गई है। भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना इसलिए जरूरी है क्योंकि उसे हाल ही महाराष्ट्र व झारखंड में झटका लग चुका है। इसके बाद उसे पश्चिम बंगाल की कठिन परीक्षा से भी गुजरना है। हालांकि दिल्ली का वोटर चतुर है, मगर कुछ कहा नहीं जा सकता। देखते हैं होता है क्या?
-तेजवानी गिरधर
7742067000
tejwanig@gmail.com

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