तारकेश कुमार ओझा
… देश और जनता की हालत से मैं दुखी हूं। इसलिए आपके बीच आया हूं। अब बस मैं आपकी सेवा करना चाहता हूं… राजनीति से अलग किसी दूसरे क्षेत्र के स्थापित शख्सियत को जब भी मैं ऐसा कहता सुुनता हूं तो उसका भविष्य मेरे सामने नाचने लगता है। मैं समझ जाता हूं कि यह बंदा भी माननीय बनने की मृगतृष्णा का शिकार हो चुका है। कुछ दिनों तक यह जैसे – तैसे अपने पद और जनता के प्रति समर्पित होने का संदेश देगा। लेकिन जल्द ही इससे ऊब जाएगा और एक दिन राजनीति को ही गंदी कह कर कोसने लगेगा। और किसी दिन …नहीं भैया नहीं , यह मेरे बस की बात नहीं कह कर फिर अपनी पुरानी दुनिया मे ंरम जाएगा।इसकी वजह पूछने पर वह नखरे दिखाते हुए कहेगा… प्लीज … नो पॉलिटिक्स…। ऐसे लोगों में भी दो तरह के चेहरे नजर आते हैं। पहला जो कुछ दिन पद – अधिकार का सुख भोग चुनाव बाद नेताओं की तरह गायब हो जाता है। जबकि दूसरा गायब तो नहीं होता लेकिन हमेशा बेचैन इधर – उधर ठौर तलाशता फिरता है। सही – सहीं वह कौन सी मानसिक स्थिति होती है जब दूसरे क्षेत्र का इंसान राजनीति में जाकर जनप्रतिनिधि बनने का सपना देखने लगता है। मैं इस मनोदशा से गुजर चुका हूं। हालांकि अधिकांश को जल्द ही इस बात का ज्ञान हो जाता है कि यह सबके बस की बात नहीं। ऐसे जनप्रतिनिधियों से पाला पड़ा जो विशेष परिस्थिति में चुनाव में खड़े होकर निर्वाचित हुए लेकिन जल्दी ही मंजे हुए बल्लेबाज की तरह राजनीति के पिच पर टिक गए। वहीं अनेक दिग्गजों की भूतपूर्व बनने के बाद दुर्दशा भी देखी है। हालांकि यह तय है कि पहले राजनीति और पद – अधिकार के लिए बाल – हठ और तुरत – फुरत इसे कोसने की प्रवृति साधारण लोगों में नहीं होती। जिंदगी इंतहान लेती है…। बचपन में सुना गया यह गाना मानो अपनी जिंदगी का कॉलर ट्यून ही बन गया। क्योंकि कम से कम अपने मामले में जिंदगी हर रोज इंतहान लेती आई है। लेकिन समय के साथ लगा कि जिंदगी केवल हम जैसे साधारण लोगों की ही नहीं बल्कि खासे ताकतवर समझे जाने वाले बड़े- बड़े लोगों से भी इंतहान लेती रहती है। साधारण बोल – चाल में मजबूरी कहे जाने वाली यह विडंबना इंसान के कद के अनुरूप घटती – बढ़ती रहती है। उस रोज टेलीविजन पर थोड़ा – थोड़ा बहुत कुछ वाले उस सेलीब्रेटी को देख कर मैं हैरान था। क्योंकि अपनी राजनीतिक निष्ठा के मामले में वे पूरी तरह से यू टर्न ले चुके थे। कैकेयी व मंथरा से पिंड छुड़ा कर वे कौशल्या की गोद में थे। अपने नए रोल मॉडल के सामने कृतज्ञ मुद्रा में खड़ी उनकी तस्वीर चेनलों पर बार – बार दिखाई जा रही थी। वाकई मुझे लगा सचमुच जिंदगी उनका इंतहान ले रही है। जो पता नहीं किस मजबूरी में अपनी ऐसी फजीहत करवा रहे हैं।अभी कुछ दिन पहले ही तो मैने अपने गृहप्रदेश में लगभग पूजे जाने वाले फिल्म अभिनेता को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देते देखा था। अपने समकक्षों की तरह वे भी बड़ी उम्मीदों के साथ राजनीति में आए थे। लेकिन चलन के अनुरूप ही जल्द ही उनका इससे मोहभंग हो गया। फिर उन्होंने अपनी पार्टी और राजनीति ही नहीं बल्कि अपने सूबे की जनता से भी दूरी बना ली। कभी – कभार उनकी संदिग्ध बीमारी और विदेश में इलाज की चर्चा सुनी। वे विदेश से लौटे और बस इस्तीफा सौंप दिया।
