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महेन्द्र सिंह भेरूंदा
मेरे इशारे पर ही काम करने वाला व्यक्ति ईमानदार है और मेरा विरोध करने वाला व्यक्ति राष्ट्रविरोधी है ।
क्या आप मेरी इस ईमानदारी और राष्ट्रभक्ति की परिभाषा से सहमत है ?
और आप सहमत है या नही इस बात से मुझे कोई फर्क नही पड़ता क्योकि मै ही स्वयम् सास्वत सत्य हूं इस लिए ईमानदारी व राष्ट्रभक्ति जैसी अनेक खुबिया मेरे ही इर्द-गिर्द ही विचरण करती है इस लिए इनको दुसरो के पास ढूंढने की कोई जरूरत नही है ।
यह वाक्य कोई गीता का अंश नही है और ना किसी के मुखारबिंदु से निकले हुए शब्द है ।
परन्तु यह कलयुग के एक प्रभावशाली व्यक्ति के उठते हुए कदमो की प्रतिध्वनि है उनके कदमो की प्रतिध्वनि से यह बात निकल कर वातावरण में फेल रही है इसी प्रतिध्वनि में रावण का अहम उच्चारित होता दिखाई दे रहा है और यही अहम वातावरण में फैलकर बहुत कड़वाहट व गर्माहट पैदा कर रहा है और इस विचारधारा की गर्माहट से बेचारा शुद्ध सत्य भी बेचैनी महसूस करने लगा है ।
तभी तो देखए ना , रिजर्वबैंक में रघुराजन को हटा कर नोट बन्दी से पहले उनकी जगह उर्जित पटेल को बेठा दिया , लिहाजा अहसान के दबाव के चलते उर्जित बाबू ने नोटबन्दी जैसे खतरनाक व अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती कदम के उपर भी कुछ ना-नुकुर नही किया और ना कोई विरोध किया तब तक तो उर्जित की ऊर्जा ठीक थी मगर फिर जब सरकार ने रिजर्वबैंक के गरेबान में हाथ डालना चाहा तब उर्जित बाबू के मुँह से केवल उफ निकल गया इस मामूली उफ को सरकार ने अपना विरोध मानकर अपने आदमी को भी नही बख्शा और उसको अपने पद से रुखसत होने पर मजबूर कर दिया क्योकि मेरा विरोध ही तो राष्ट्रविरोध है !
और अभी ताजा सीबीआई के नाटक में तो कलयुग के अवतार ने हद ही कर डाली नियमो को ताक में रखकर विभाग के सीबीआई चीफ को जबरन छुट्टी पर भेज दिया ।
सरकार के इस बेहूदे निर्णय के खिलाफ अलोक वर्मा ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर की और फैसले में इस कोर्ट ने सरकार की इस कार्यवाही को गलत बताया और कोर्ट ने अलोक वर्मा को सीबीआई चीफ के पद पर पुनः बेठा दिया मगर कोर्ट के आदेश के मुताबिक वर्मा के बारे में सलेक्शन कमेटी को फैसला करने के निर्देश को हथियार बनाकर सरकार ने अपनी आदत के मुताबिक अपना हठ पूरा करने के लिए सलेक्शन कमेटी की एक विवादित बैठक बुलाकर फिर वर्मा को हटाने का विवादित आदेश पारित कर दिया जिसकी आलोचना न्याय के जानकार लोग बराबर करते आ रहे है ।
मगर इस में मुख्य बात यह है कि वर्मा का इस पद पर चयन इसी सरकार का था और कार्यकाल दो वर्ष का था और सरकार को वर्मा के एक वर्ष व दस माह के कार्यकाल में कोई भरष्टाचार नजर नही आया और आखरी दो माह में मर्जी के अनुरूप कार्य नही किया तो स्वतन्त्र संस्थान सीबीआई को अखाडा बना दिया जबकि वर्मा को चीफ बनाने वाली कमेटी के मोदीजी ही अध्यक्ष थे और इन वर्मा जी को सीबीआई में ईमानदार कह कर तो लगाया था और चोर बता कर निकाल दिया और यदि वर्मा चोर ही थे तो अपने रास्ते से चोर को हटाना कोई दण्ड नही है उसपर मुकदमा क्यों नही दर्ज हुआ ?
और जबकि सलेक्शन कमेटी पर निगरानी रखने वाले जज ने वर्मा के ऊपर हुई कार्यवाही को अनेतिक बताया और यह निर्णय न्याय संगत भी नही है ।
अब आप ही बताएं की ऊपर लिखी अपनी परिभाषाओ को सिद्ध करने के लिए यह महाशय क्या क्या करेंगे ?
यह तो अपना सब कुछ सिद्ध करने के लिए ही तो सीबीआई को उल्टा लटका के हेंगर पर टांक दिया इसमें किसी बड़े अधिकारी की मोत इनके लिए कोई मायने नही रखती है ।
महेंद्र सिंह भेरुन्दा

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