जीवन हो या नाटक, अंतिम सीन के लिए डॉक्टर का होना जरूरी

समीक्षा
पूर्णांकी नाटक : ‘मौत जिनके करीब होती है
लेखक-निर्देशक : 👥 दयानंद शर्मा

मंचन : 19-20 अक्टूबर 2019 / रंगमंच : रेलवे प्रेक्षागृह, बीकानेर / संगीत प्रभाव : महताब खान /प्रकाश प्रभाव : आमिर हुसैन /नृत्य निर्देशक : रेशु माथुर / मंच सज्जा : शशांक रामानन्द / अवधि : लगभग डेढ़ घंटा
प्रस्तुति : उपरे ललित कला संस्थान राजश्री कला केन्द्र / प्रस्तुति प्रभारी : तरुण गौड़

मोहन थानवी
बीकानेर और राजस्थान की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय स्तर पर रंगकर्म के क्षेत्र में बीकानेर के वरिष्ठ रंगकर्मी लेखक निर्देशक दयानंद शर्मा का नाम विख्यात है। नवोदित कलाकारों के साथ श्रेष्ठतम प्रस्तुति देने के लिए गारंटीशुदा नाम है दयानंद शर्मा। इन्हीं दयानंद शर्मा के लिखे और निर्देशित नाटक मौत जिनके करीब होती है का मंचन 19 और 20 अक्टूबर 2019 को बीकानेर में उत्तर पश्चिम रेलवे ललित कला संस्थान एवं राजश्री कला मंदिर के संयुक्त तत्वावधान में रेलवे परीक्षा गृह में किया में किया गया। दयानंद शर्मा ने 20 से अधिक नाटक लिखे हैं। स्वयं 50 से अधिक नाटकों में अभिनय किया है और 40 नाटकों का निर्देशन भी आपके नाम है। अलावा इसके दयानंद शर्मा कवि कथाकार आलोचक अनुवादक संपादक शिक्षक नाट्य प्रशिक्षक प्रबंधक और मंच संचालन के क्षेत्र में भी अपना सानी नहीं रखते। इनके कुशल निर्देशन में मौत जिनके करीब होती है नाटक के पहले दिन का मंचन की शुरुआत ही गहरी और प्रभावी आवाज के साथ हुई। यह संचालक और नाटक के प्रस्तावक की आवाज थी। प्रेक्षागृह में लगभग 3 मिनट की इस प्रस्तावना और उद्घोषणा से ही नाटकीय रंग गहरा गए । प्रमुख सभी पात्रों के नृत्य के साथ प्रथम दृश्य समा बांधने में सफल रहा और यह क्रम यवनिका के लहराने तक बरकरार रखने में निर्देशक और नाटक की समस्त टीम शत प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली बनी। जीवन के रंगों को संवेदनाओं, कटाक्षों और हास्य के साथ पिरोते हुए नाटक के पात्र एक माला में गुंथे फूलों की तरह खुशबू बिखेरते रहे। अस्पताल में उपचाराधीन गंभीर रोगों से पीड़ित और मृत्यु से वार्तालाप कर रहे पात्रों की वाचालता और जीवंतता को दयानंद शर्मा ने अपने निर्देशकीय कौशल से दर्शकों तक संप्रेषित करवाया कि आभास तक न हुआ कि मंच पर नवोदित हैं, बल्कि यूं लगा मानों अनुभवी रंगकर्मी अपने रंग जमा रहे हैं । साथ ही अव्यवस्थाओं के शिकार अस्पताल के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, सेवाभावी मृदुभाषी डॉक्टर व नर्स की मानसिकता एवं भावनाओं को भी बखूबी संप्रेषित किया गया। किशोरावस्था की वर्तमान समस्याओं और राजनीतिक दंभ में जी रहे नेताओं के चरित्र भी मुखरता से मंचित किए गए । सिनेस्टार बनने की आकांक्षा रखने वाला युवा, गायक व उसकी नेत्र ज्योति विहीन मां, परिवार से खिन्न मां को जी जान से प्यार करने वाला बालक, नर्स और कर्मचारी भलाराम, दृष्टिबाधित मां उन पात्रों में हैं जिन्हें इस नाटक के प्राण तत्व कहा जा सकता है। हां, एक दृश्य में युवा पत्नी और मां मूर्तिवत बैठ रहने की बजाय एक-दूसरे से बतियाते दिखते तो स्वाभाविक ही लगता। जीवन की मानिंद नाटक में भी अंतिम दृश्य में एक प्रभावी डॉक्टर की जरूरत महसूस हुई। एक पात्र गंभीर बीमार है वह मृत घोषित कर दिया जाता है और कुछ देर बाद वह जी उठता है। इस मौके पर पात्र और अधिक प्रभाव छोड़ सकते थे। लगभग डेढ़ घंटे तक नवोदित कलाकारों के द्वारा निर्बाध प्रभावी रंग दिखाना सराहनीय और प्रशंसनीय है। मंच संचालक व प्रस्तावक का जिम्मा वरिष्ठ रंग निर्देशक सुरेश हिन्दुस्तानी ने बखूबी सम्भाला। समस्त टीम को रंग-जगत में शिखर तक पहुंचने की शुभकामनाएं ।
– ✍️ मोहन थानवी, बहुभाषी नाटककार
9460001255

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