*विचार – प्रवाह*

नटवर विद्यार्थी
हास्य सम्राट काका हाथरसी की जन्म तारीख़ 18 सितम्बर और निधन तारीख़ भी 18 सितम्बर ही थी । उनके निधन के बाद शवयात्रा ऊंटगाड़ी पर निकली । श्मशान घाट पर एक ओर अंत्येष्टि चल रही थी और दूसरी हास्य कवि- सम्मेलन का आयोजन चल रहा था जिसमें उपस्थित सभी लोग ठहाके लगा रहे थे । बात विचित्र सी है किंतु सत्य है । काका हाथरसी ने स्वयं अपनी वसीयत में यह लिखा था कि मेरे जाने पर कोई रोए नहीं बल्कि मुझे हँसते हुए विदा करें ।
काका हाथरसी जाते -जाते भी यह संदेश दे गए कि केवल ख़ुशी के पल बिताना ही उत्सव नहीं है अपितु दुःख और परेशानियों के क्षण गुजारना भी उत्सव है । जन्म से लेकर मृत्यु तक इंसान न जाने किन – किन पड़ावों से गुजरता है । पड़ाव गुजरते जाते हैं और जीवन व्यतीत होता रहता है । सकारात्मकता व्यक्ति में ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार करते हुए हर स्थिति को उत्सव का रूप देती रहती है और नकारात्मकता खुशी के अवसरों को भी उससे छीन लेती है ।
उत्सव आते हैं और चले भी जाते हैं । जिसने जीवन के हर क्षण को उत्सव का रूप देना सीख लिया वह विशेष दिनों में ही नहीं अपितु हर दिन प्रफुल्लित रहता है । प्रतिदिन स्वयं के एवं औरों के जीवन में खुशियाँ बिखेरें । मकर सक्रांति महोत्सव की शुभकामनाएं ।

– नटवर पारीक

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