ब्रिटिश हुकूमत में जुल्म की इंतहा और न्याय का नाटक

बी एल सामरा “नीलम “
जब हमारे देश की संपूर्ण जनता देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रही थी , भारतवर्ष में अंग्रेज हाकिम और उनकी अदालते न्याय का नाटक कर जुल्म इंतहा पार कर रहा थी , इसकी बानगी स्वयं हमारे राष्ट्रपिता बापू द्वारा वर्ष 1921 में प्रकाशित साप्ताहिक पत्र हिंदी नवजीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है । *इस सप्ताहिक पत्र नवजीवन के 52 अंक भारतीय जीवन बीमा निगम मंडल कार्यालय अजमेर से सेवानिवृत्त शाखा प्रबंधक अजमेर निवासी बी एल सामरा के पास वर्षों से खादी की जल्द में सुरक्षित है*।*यह अखबार सारंगपुर अहमदाबाद की नवजीवन प्रिंटिंग प्रेस से प्रति सप्ताह रविवार को प्रकाशित होता था । सवा आने प्रति अंक की कीमत वाले इस अखबार के संस्थापक संपादक गांधीजी स्वयं थे मगर उनकी जेल यात्रा के दौरान उनके विश्वसनीय सहयोगी और सचिव रहे हरिभाऊ उपाध्याय ने किया जो बाद मे अजमेर मेरवाड़ा के पहले मुख्यमंत्री बने और स्वयं गांधीजी के आदेश से उन्होंने अजमेर
आ कर हटुंडी में गांधी आश्रम की स्थापना की।गांधी जी के इस नवजीवन सप्ताहिक समाचारपत्र कावार्षिक शुल्क मात्र ₹4 था तथा इस पत्र के प्रकाशक स्वयं महात्मा गांधी के बड़े पुत्र रामदास मोहनदास गांधी थे।
भारतीय जीवन बीमा निगम के सेवानिवृत्त शाखा प्रबंधक बीएल सामरा ने महात्मा गांधी के साप्ताहिक समाचार पत्र नवजीवन के हवाले से अंग्रेजी शासन की उस दौर में अदालतों में न्याय के नाटक की तस्वीर पेश की है ,उस दौर के शासन में अंग्रेजों के जुल्मों सितम की कहानी तत्कालीन अखबारों की सुर्खियां नही बन पाई । उस समय के वायसराय लॉर्ड रिंडिंग भारत में आने से पूर्व ब्रिटेन के न्याय मंत्री रह चुके थे ।उन्हीं के कार्यकाल में न्याय की कैसी धज्जियां उड़ाई गई , इसकी ज्वलंत मिसाल नवजीवन अखबार में प्रकाशित की गई जिसका उल्लेख करना यहां प्रासंगिक है । प्रथम घटना मालाबार ट्रेन दुर्घटना से संबंधित है, जिसमें 192 लोगों को मालगाड़ी के डिब्बे में ठोस पुष्कर भर दिया गया था । अगले स्टेशन पर उनमें से 122 लोग मृत पाए गए , जिनकी दम घुटने के कारण मृत्यु हो गई क्योंकि मालगाड़ी के डिब्बों में खिड़कियां तो होती नहीं है । इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए और 1 वर्ष तक प्रकरण की जांच कार्यवाही का नाटक किया और नतीजा यह रहा कि जांच में कोई भी दोषी नहीं पाया गया। दूसरी घटना सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान शांतिपूर्ण अहिंसक जुलूस की है , जिसमें दमन चक्र की इंतहा करते हुए पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज कर दिया जिसके कारण भीड़ अनियंत्रित और हिंसक हो गई तथा आगजनी की कुछ घटनाएं हुई जो तात्कालिक आक्रोश का परिणाम थी ।इस घटना की भी न्यायिक जांच हुई ।जुलूस में शामिल एक सौ से अधिक लोगों को दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा दे दी गई । न कोई सुनवाई ,न कोई अपील बस अदालत के एक मात्र जज ने 122 लोगों को फांसी की सजा दे दी । वाह रे अंग्रेजी न्याय ! जिस ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था , ऐसा कहा जाता है , उनकी हकूमत के राज में ऐसा न्याय ! बर्बरता पूर्ण फैसला जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिल सकती । एक अन्य मुकदमे के दौरान एक रियासत के राजा और रानी को अपने अपने पैतृक निवास के महल में प्रवेश के लिए ताला लगाकर रोक दिया गया तो उन्होंने लुहार को बुलवाकर ताला तोड़ दिया और भीतर प्रवेश किया तो इसके लिए उन्हें हिरासत में ले लिया गया । दरोगा ने माफी मांगने को कहा ,जिसके लिए वे तैयार नहीं हुए तो कोर्ट में चालान पेश कर दिया । महीनों तक मुकदमे की कार्यवाही चली , अदालत का समय जाया हुआ और अंततः उन्हें अपने पैतृक मकान में प्रवेश के लिए सजा सुनाई गई , वह थी, अदालत में केवल 5 मिनट बैठने की ।
सबसे अहम और चर्चित मुकदमा महात्मा गांधी से संबंधित है , जिन्हें महज 8 दिन की न्यायिक कार्यवाही के पश्चात राजद्रोह के अपराध में 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई दी गई और अपने इस मुकदमे की पैरवी स्वयं बापू ने की क्योंकि वह खुद बैरिस्टर थे , उन्होंने अजमेर की सभा में 8 और 9 मार्च वर्ष 1921 में दिए गए अपने भाषण के अंश को अदालत में दुहरा कर उसकी पुष्टि की और अदालत में बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए बल्कि सजा सुनकर अंग्रेज मजिस्ट्रेट को धन्यवाद भी दिया क्योंकि उसी अदालत ने उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले को भी 6 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी । सजा सुनकर गांधी जी ने कहा था , जज साहब ! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आपने मुझे मेरे गुरु के समकक्ष खड़ा कर दिया । गांधीजी के खिलाफ चली इस मुकदमे की कार्यवाही का आंखों देखा हाल अदालत की विशेष अनुमति से उस समय वहां उपस्थित पत्रकार नरहरि चिंतामणि देशमुख ने स्वयं रिकॉर्ड किया बाद मे जो गांधीजी के अखबार में प्रकाशित हुआ । इसमें वे लिखते हैं कि 18 मार्च 1921 को इस अदालत में वह ऐतिहासिक दृश्य उपस्थित हुआ जो ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में अनूठा और अद्वितीय था जिसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी । वे लिखते हैं ,अदालत मे अंग्रेज न्यायधीश जस्टिस ब्रूमफील्ड ने प्रवेश किया तो सब लोग जो अदालत में उपस्थित थे , अपने अपने स्थान पर खड़े हो गए । अदालत के कटघरे में मुजरिम के रूप में मोहनदास करमचंद गांधी खड़े थे । जज साहब ने अपना आसन ग्रहण करने से पूर्व गांधीजी को संबोधित करते हुए अपना सिर झुका कर कहा ,आई सैल्यूट मिस्टर गांधी यू हैव डन योर ड्यूटी टुवर्ड्स योर नेशन एंड नाउ आई एम गोइंग टू डू माय ड्यूटी टुवर्ड्स माय गवर्नमेंट । इसके बाद उन्होंने गांधी जी को 6 वर्ष के कारावास की सजा सुना दी ।उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी 8 मार्च को अजमेर आए थे , जहां उन्होंने सार्वजनिक मीटिंग में जनता को अंग्रेजी कानून का बहिष्कार करने की बात कहीं , जिसे राजद्रोह माना गया और उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया मगर अशांति की आशंका के चलते अजमेर में उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई और वे 9 मार्च की रात्रि में अहमदाबाद के लिए ट्रेन से प्रस्थान कर गए तथा 10 मार्च को प्रातः अहमदाबाद पहुंचते ही उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर अदालत में प्रस्तुत किया गया । अदालत ने राजद्रोह के मुकदमे की कार्यवाही प्रारंभ की और महज 8 दिन में अपनी कार्यवाही पूर्ण कर 18 मार्च को इस मुकदमे का फैसला सुना दिया । गांधी जी को पुणे की यरवदा जेल भेज दिया गया । यह पुणे की वही कुख्यात जेल है , जहां आतंकवादी कसाब को भी रखा गया ।
तो यह है , अंग्रेजी शासन के दौरान हुए जुल्मों सितम की दास्तान का सच्चा विवरण , जहां एक और सैकड़ों लोगों की मालाबार ट्रेन दुर्घटना में हत्या होने के बावजूद न्यायिक जांच में किसी को दोषी नहीं पाया गया , वही अहिंसक जुलूस पर उग्र लाठीचार्ज की प्रतिक्रिया स्वरूप अनियंत्रित भीड़ मे सम्मिलित 100 से ज्यादा लोगों को एक साथ एक ही अदालत ने फांसी की सजा सुना दी और सिर्फ सिर्फ अजमेर की सभा में भाषण देने के आरोप में राज्य द्रोह का मुकदमा चलाकर महात्मा गांधी को 8 दिन बाद ही 6 वर्ष के कारावास की सजा सुना दी ।
उस दौर की अनेक ऐसी घटनाएं हैं , जो हमारे देशभक्त क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों की उस दौर में जेल यात्रा के दौरान जुल्म और सितम की सैकड़ों कहानियां इतिहास में दर्ज भी नहीं हो पाई मगर देशभक्त नौजवानों का जज्बा और जुनून उन्हें आजादी के लिए बलिदान करने से विमुख और विचलित नहीं कर सके और अंततः देश ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी हासिल की ।

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आज से सौ वर्ष पूर्व महात्मा गाँधी ने अजमेर की धरती से अंग्रेजी राज के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा कर आजादी की लड़ाई का आगाज़ किया , वह समय मार्च का महीना ही था और इसी मार्च माह में उन्होंने अपने साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था, हिन्दी संवत के प्रथम दिवस वर्ष प्रतिपदा को । इतना ही नहीं हमारे राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर से पहली मुलाक़ात भी शांति निकेतन में 6 मार्च 1914 को की थी तथा वहां शांति निकेतन में ही विद्यार्थियों को स्वावलम्बन का प्रशिक्षण दिया था ।इसी मार्च माह में 8 मार्च को गांधी जी अजमेर आये, यहाँ उन्होंने सार्वजनिक सभा में अंग्रेजी कानून का बहिष्कार करने का आव्हान किया जिसे राजद्रोह माना गया और अजमेर में ही 9 मार्च को उनके गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए मगर वे रेल द्वारा अहमदाबाद के लिए प्रस्थान कर गए ।अहमदाबाद पहुँचने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । 10 मार्च को वे गिरफ्तार हुए और उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया तथा महज आठ दिन चली कार्यवाही के बाद अदालत ने उनको छः वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुना दी । इसके विरोध में 18 मार्च को राष्ट्र व्यापी बंद आयोजित कर काला दिवस मनाया गया । यह तमाम जानकारी स्वयं गांधी जी के अखबार हिन्दी नवजीवन में प्रकाशित विवरण पर आधारित है जिसके 52 अंक मेंरे संग्रह में सुरक्षित है ।
*बी एल सामरा नीलम*

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