मेवाड़ का गौरव छापली

महाराणा प्रताप की विजय स्थली दरअसल छापली है , जो दिवेर के दर्रे के समीप स्थित है। यह मेवाड़ के सैनिकों की छावनी और छापामार युद्ध के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है यहां रावत राजपूत सैनिक अलग-अलग ढाणियों में निवास करते थे ।आज भी छापली 12 जगह टुकड़ों में बसी हुई है। हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात मुगलों ने दिवेर में अपना अधिपत्य कर थाना स्थापित कर दिया था ।कालांतर में मुगलों के साथ छापामार युद्ध करते हुए महाराणा ने छापली को छापामार युद्ध का केंद्र बनाया यही के जंगलों में निवास करते हुए मुगलों के खिलाफ लोहा लेने के लिए अपनी गतिविधियां संचालित करने लगे । यहां के जंगल में आज भी गोकुल गढ़ किले के अवशेष विद्यमान है ,जहां महाराणा ने निवास किया था और दिवेर के थाने पर हमला कर राणा जी और उनके सैनिकों ने मुगल सैनिकों को वहां से खदेड़ कर भगा दिया और दिवेर के दर्रे पर मोर्चाबंदी कर मुगल सैनिकों को मेवाड़ की तरफ आगे बढ़ने से रोका । जहां पर महाराणा प्रताप ने अपनी मोर्चाबंदी की , वह जगह राणा कड़ा के नाम से जानी जाती है जो दरअसल राणा अड़ा का अपभ्रंश है ।महाराणा प्रताप के साथियों ने मुगल सैनिकों को वहां से खदेड़ कर भगा दिया और उनका पीछा करते हुए छापली के मैदान में उनसे डटकर लोहा लिया और मुगल सैनिकों के दांत खट्टे कर दिए।
उनके सेनापति को अपनी तलवार के एक ही भरपूर वार से घोड़े सहित दो भागों में चीर दिया और मुगल सेना को दिन में तारे दिखा दिए । छापली के मैदानी भाग में भीषण युद्ध हुआ ।भारी तादाद में मुगल सेनिक हताहत हुए , तो खून की नदियां बह चली, आज भी उस जगह को रगततलाई के नाम से जाना जाता है। युद्ध में वीरगति प्राप्त मेवाड़ी वीरों का सामूहिक दाह संस्कार जिस स्थान पर किया गया वहां पर भारी मात्रा में राख जमा होने से जमीन ठोस नहीं बन पायी और खोखला होने की वजह से धम -धम की आवाज करती है , वह आज भी दमदमा के नाम से जाना जाता है।हताहत मुगल सैनिकों को भी वहीं दफन किया गया ,जो कब्रिस्तान नाम से जाना जाता है ,जबकि गांव में एक भी मुसलमान निवास नहीं करता था । जहां पर घायल सैनिकों को इलाज के लिए लाया गया, उस कैंप की जगह को आज भी शफाखाना के के नाम से जाना जाता है। युद्ध क्षेत्र को मियां मंगरा के नाम से जाना जाता है ।मेरी माध्यमिक शिक्षा इसी गांव छापली के हाई स्कूल से हुई ,जहां मेरे फूफा साहब के सानिध्य में वहीं पर किशोरावस्था व्यतीत हुई और संयोग से वही छापली में विवाह होने से मेरा ससुराल भी हो गया ।जहां महाराणा प्रताप की वास्तविक वास्तविक विजय की गौरव गाथा का स्वर्ण पृष्ठ लिखा गया । छापली और दिवेर के बीच की दूरी केवल 5 किलोमीटर है और मेरा गांव आसन( ठीकरवास) स्थित है , जो कि मेवाड़ की सीमा का अंतिम
गांव है जो छापली से कोई 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित है ,उसके बाद अजमेर मेरवाड़ा की सीमा आ जाती है l *”आम महुआ फल घणा , हालरिया हुलराय । सागर भरिया अथाह जल , बिच राष्ट्रीय मार्ग सुहाय ।। छवि जोवंता छापली म्हानै और ना आवे दाय ।”*

राजस्थान पर्यटन विभाग की मेवाड़ काम्पलैक्स परियोजना के अंतर्गत छापली को महाराणा प्रताप की विजय युद्ध स्थल के रूप में मान्यता प्रदान कर यहाँ लाखों रुपये व्यय कर वार मेमोरियल के तहत युद्ध स्मारक बनाया गया है किन्तु अत्यंत अफ़सोस जनक है कि गौरवशाली अतीत और इतिहास का जीवंत स्मारक होने के स्थान पर यह ढांचा अराजक तत्वों , शराबियों नशेडियो और जयराम पेशा अपराधियों का अखाड़ा बन चुका है । सैकड़ों की संख्या में शराब की खाली बोतलें इधर उधर बिखरी पड़ी है जो इस मेवाड़ धरा के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के गौरवशाली इतिहास को विस्मृतियों के घोर अंधियारे में धकेल कर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है मगर इस युद्ध स्मारक की सुध लेने वाला कोई नहीं है । इस क्षेत्र के कतिपय जागरूक नवयुवकों ने महाराणा प्रताप युद्ध स्मारक समिति बनाकर विभागीयअधिकारियों, जिला प्रशासन और राज्य सरकार से पत्रव्यवहार कर एवं शिष्ट मंडल के रुप मुलाकात कर अपनी व्यथा जाहिर की है तथा युद्ध स्मारक को उचित रखरखाव और विकास हेतु उपयुक्त संस्था अथवा समिति को दीर्घ कालीन अनुबंध के आधार पर सुपुर्द करने की मांग की है ताकि उनके द्वारा इस स्थल को गौरवशाली पर्यटन केन्द्र के रुप विकसित कर मेवाड़ गौरव केन्द्र की पहचान दिलायी जा सके। महाराणा प्रताप की जयंती के अवसर पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी और देश की स्वतंत्रता रक्षा के लिए जान की बाजी लगाने वाले महान सपूत के शौर्य का सम्मान होगा ।
मेवाड की आन बान शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर सेनानी महाराणा प्रताप को नतमस्तक भावभीनी श्रद्धांजलि ! शत शत-शत नमन !

आलेख
*बी एल सामरा नीलम*
पूर्व प्रबन्ध सम्पादक कल्पतरू हिन्दी साप्ताहिक एवं मगरे की आवाज पाक्षिक पत्र

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