“पर्यावरण दिवस” पर एक नई ग़ज़ल

कुदरत से खेल कर बिगाड़ दी आबो- हवा तुमने
दुनिया में फैला दी है कैसी घातक बवा तुमने….
मांगनी थीं दुआएं जिस क़ायनात के लिए
उस हसीन शय को लगा दी कैसी बद्दुआ तुमने….
अब ज़लज़लों, तूफ़ानों में घिरी हुई है ज़मीं
भुगतो अब सज़ाएं, जो किया है गुनाह तुमने…
कहते थे दानिशवर ज़िन्दगी, नेमत खुदा की है
उड़ाते रहे धुंए में, ना माना मशवरा तुमने..
काटे भी वही दरख़्त, जो साये थे पीढ़ियों के
दिखाया है ग़ज़ब जाहिलाना हौसला तुमने…
तुमको कहाँ थी फिक्र मादरे-वतन की हिन्द वालों
नोच कर दामन, अपनी माँ को किया नंगा तुमने…
कर्ज़े चुका ना पाएंगी, भुगतेंगी पुश्तें देखना
उजाड़ कर जायदाद लिखा है वसीयतनामा तुमने
–अमित टण्डन, अजमेर।

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