कल शिवरात्रि थी
मैं भक्त था, तुम भगवान थे।
मंदिर का बाहर मैं खड़ा,
तुम अंदर विराजमान थे।
ग़ज़ब की भीड़ थी कल जोश में उन्माद में,
गूंज रहा था सकल मंदिर “जय भोले’ के नाद में।
मैं देख रहा था आपके भक्तों को जो आपकी तरफ जा रहे थे,
एक हाथ में लोटे में दूध और दूजे में थाली लिए आपका नाम गा रहे थे।
बेर, फल, फूल, दूध आदि से तुम्हारा भोग लग रहा था,
उल्लास और भक्ति का अतुलनीय योग लग रहा था।
हाथ जोड़ मंदिर से मैं ज्यों ही आगे बढ़ा,
मेरी ओर एक छोटा मैला-कुचेला अनायास किसी का हाथ बढ़ा।
कह रहा था मुझे थोड़ा सा खाना खिला दो,
अगर हो सके तो मेरी तीन साल की छोटी बहन को भी दूध पिला दो।
देखो बाबूजी ! वो सामने रोड के उस पार मेरी छोटी बहन बैठी हुई है,
भूख से बाबूजी उसकी उसकी आँतें ऐंठी हुई हैं।
दर्द है उसके पेट में बाबूजी भूख के मारे,
मेरे दिल में उतर गए वो भाई-बहन बेचारे।
कुछ कर मैं दुकान से दूध और कुछ फल लाया,
आपकी पूजा मानकर मैंने उन बच्चों को खिलाया-पिलाया।
उन बच्चों के चेहरे पर अब सुकून था, आराम था।
और थकी हुई उन आँखों की बेचैनी पर अब थोड़ा विराम था।
मैं उल्लसित था, जब वो बच्चे मुस्कुरा रहे थे,
मेरे प्रभु मुझे तो उन बच्चों के होंठों पर तुम मुस्कुराते हुए नजर आ रहे थे।
मंदिर के अंदर दूध लबालब चढ़ रहा था,
भक्तों के सैलाब बढ़ रहा था।
फल और फूल भी अपार चढ़ रहे थे,
पुजारियों की जेबों के वजन भी बढ़ रहे थे।
भगवान दूध पी रहे हैं, ऐसा कोई भक्त कह रहा था,
विस्मित तो मैं तब हुआ जब मंदिर के पीछे मैंने देखा,
नाली में वो सारा दूध बह रहा था।
आज सुबह,
वही मंदिर लग रहा है कुछ अकेला,
कल जहां लगा हुआ था तुम्हारे भक्तों का मेला।
लबालब कूड़ा कूड़ेदान में भरा हुआ था,
कुछ तो कूड़ेदान में, तो कुछ कूड़ेदान के बाहर फैला हुआ था।
उस कूड़े में दिखे वो ताजे फल, तो तुम पर अर्पित हो रहे थे,
मैं तो प्रभु चरणों में हूँ, ऐसा सोच कर वो गर्वित हो रहे थे।
अब तो फल, फूल और कूड़ा सब एक समान नजर या रहा था,
जो मिटा सकते थे भूख किसी की, वो ‘कूड़ा’ अब तो कोई भी नहीं खा रहा था।
कल शिवरात्रि थी,
मैं भक्त था तुम भगवान थे।
लेकिन प्रभु ऐसी हो महाशिवरात्रि
ऐसे नहीं मेरे अरमान थे।
राज महाजन