
तभी मुझे याद आया. हमारें मोहल्लें में एक कॉलेज के लैक्चरार रामगोपालजी रहते थे. हिन्दी साहित्य में एम.ए थे. जब उन्होंने भक्तिरस के कवि सूरदास, केशवदास आदि का तुलनात्मक अध्यन कर पीएचडी करली तो उनके नाम के आगे डाक्टर लग गया. ऊन्होंने उत्साहपूवंक डाक्टर नाम से घर के बाहर अपनी नेमप्लेट लगवाली.
बस फिर क्या था पास पडौस के लोग गाहे बगाहे, सुबह देखे न शाम, उनके घर पर मंडराने लगे. कोई पेट ददं की दवाई मांगने आरहा है तो कोई सरदी जुखाम की, कोई माँ अपने बेटे को गोद में लिए उसके बुखार का बखान करने पहुंच रही है तो कोई अपने सिरददं की गाथा गा रहा है. उन लोगो को डाक्टर साहब ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सब व्यथं. हार थक कर उन्होंने डाक्टर नामकी नेम प्लेट ही हटाली. आप ही बतायें और क्या करते ?
इसलिए मैंने भी अपने विभागाध्यक्षजी को उस समय मना कर दिया और कहा सर ! मैं पीएचडी करके क्या करूंगा, जो हूं वही ठीक है लेकिन आज जब यह सुना कि सरकार ने डाक्टरों की रिटायरमेंट आयु 60 से बढाकर 65 साल करदी है तो मुझे अफसोस हो रहा है कि तब विभागाध्यक्ष की बात मान लेता तो आज मेरे भी अच्छे दिन आजाते और मैं भी टू इन वन यानि इंजीनियर के साथ साथ डाक्टर होजाता और इधर बीबी के रोज रोज के उलाहने नही सुनने पडते जो कहती रहती है कि आपकी बजाय किसी डाक्टर से शादी करती तो डाक्टरनी तो कहलाती.