👉 _*दरकते रिश्तों और टूटते कच्चे धागों से अब बदल रहे हैं रिश्तों के मायने*_
👉 _*कलयुग कहें या भौतिकवादी युग-पद, पैसा और प्रतिष्ठा हो गए बलवान*_
👉 _*अहंकार इतना ज्यादा, एक कोख से जन्मी औलादें में पनप रही है खाई*_
👉 _*अहंकार और घमंड लील रहा है अपनापन व भाई-बहन के रिश्ते को*_
✍️ *प्रेम आनन्दकर, अजमेर।*
जी हां, यह कुछ ऐसे वाक्य हैं, जो वर्तमान और इस कलयुग में रिश्तों की सच्चाई को बयां करने के लिए काफी हैं। भले ही हर साल रक्षाबंधन यानी राखी का पर्व मना लें, लेकिन इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि अब सब-कुछ धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। अनेक ऐसे परिवार होंगे, जहां भाई-बहन के बीच आज भी वही रिश्ता कायम है, जो कभी एक घर-आंगन में खेलते, पढ़ते और साथ-साथ जीवन में आगे बढ़ते हुए हुआ करता था। लेकिन अनेक परिवार ऐसे भी होंगे, जिनमें सगे भाई-बहन यानी एक मां की कोख से जन्म लेकर युवा होने और शादी होकर जीवन की नई शुरूआत करने तक गहरा नाता था। किंतु शादी होने के बाद ऐसा क्या हुआ कि आज सगे भाई-बहन के रिश्तों में खाई पैदा होने लग गई है। आखिर क्यों ऐसी स्थिति पैदा होती है या हो रही है, इसका कारण जानने के लिए मैंने अनेक ऐसे परिवारों की कहानी जानने का प्रयास किया। उत्तर में छिपे यह कारण ही दिखाई दिए-पद, पैसा और प्रतिष्ठा। चौथा सबसे बड़ा कारण है मां-बाप की संपत्ति पर अधिकार या हिस्सेदारी। मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि क्या सगे भाई-बहन के बीच झगड़े के यह चार कारण क्यों पनप रहे हैं। यदि यही कारण वास्तव में झगड़े की जड़ हैं, तो सवाल उठता है कि शादी से पहले यह झगड़े क्यों नहीं हुए। झगड़े के कारण चाहे जो भी हो, लेकिन संबंधों की नाजुक डोर को इतना भी मत खींचो कि वो हमेशा के लिए टूट जाए। यदि भाई अच्छा पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी लग गया या लग जाता, तो उसे इतना घमंड हो जाता है कि बहन ही नहीं, अपने माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों को भी ’’कुछ नहीं’’ समझता है। इसी प्रकार यदि बहन भी सरकारी या मोटे वेतन वाली प्राइवेट नौकरी पा लेती है, तो अपने भाई ही नहीं, नाते-रिश्तेदारों से भी खुद को ज्यादा ऊंचा समझने लगती है।
