पिता अंधियारे में रोशनी है

प्रेम आनंदकर
पिता अंधियारे में हमारी रोशनी है।
पिता बिना नहीं कोई जिंदगानी है।।
खुद फटे लिबास में जीवन बिताते हैं।
बच्चों को अच्छे-अच्छे पहनाते हैं।।
हमारी मां की चूड़ी, बिंदी, सुहाग हैं।
वही तो हमारी धुरी और आस हैं।।
जिनकी बदौलत पाई हमने जिंदगी।
उन्हीं के कदमों में है हमारी बंदगी।।
पिता का साया है तो हम महफूज हैं।
पिता के बिना जिंदगी नहीं कुछ है।।
माता-पिता ही भगवान की मूरत हैं।
फिर भी हम पत्थरों में ढूंढते सूरत हैं।।
वे ही हमारे सारे तीर्थ और मंदिर हैं।
वे ही तो सारे जहां में सबसे सुंदर हैं।।
उनके ऋण से उऋण नहीं हो पाएंगे।
वे अपना तिरस्कार सह नहीं पाएंगे।।
भूले से भी मत करना कभी अनादर।
वरना समाज में नहीं मिलेगा आदर।।
जो तुम अपने माता-पिता को दोगे।।
वही तुम भी अपने बच्चों से पाओगे।।
तुम ही हो उनके बुढ़ापे का सहारा।
तुम ही तो हो उनका जीवन सारा।
कभी उनको वृद्धाश्रम मत दिखाना।
जीते जी उनकी खूब सेवा करना।।
तुमको भरपूर यश व कीर्ति मिलेगी।
उनकी कृपा से धन दौलत मिलेगी।।
(आज पितृ दिवस पर मेरे स्वर्गीय पिताजी को दंडवत नमन करते हुए मेरी मां के चरणों में सादर समर्पित स्वरचित रचना)
*-प्रेम आनन्दकर*
अजमेर (राजस्थान)

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