
यह श्लोक युद्ध की पृष्ठभूमि में कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में चौथे अध्याय के 7,8 वें श्लोक में कहा कि साधु संतों के कष्ट मिटाने, दुष्टों का नाश करने और धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए उन्होंने अवतार लिया है। इतने बड़े कार्य को सम्पन्न करने के लिए उन्होंने अर्जुन को माध्यम बनाया इसलिए अर्जुन कर्ता नहीं, माध्यम है। माध्यम को किसी भी कर्म का फल नहीं बांधता है। दूसरी बात कि अर्जुन दिव्य वैकुंठ लोक में श्रीकृष्ण का पार्षद है। अवतार के वक्त कृष्ण उसे धरती पर ले आये। उसे एक अनुपम , अजेय योद्धा की भूमिका निभानी थी। इस कारण भी न तो उसकी कोई कामना थी और न ही द्वंद्व। किंतु वर्तमान जन्म वाली भूमिका निभानी थी।
वही भूमिका निभाते हुए उसने कहा कि – 1. इतने लक्षाधिक निर्दोष योद्धाओं को मारने के बदले मेरे को हस्तिनापुर का राज्य नहीं चाहिए 2. सम्पूर्ण धरती का साम्राज्य भी नहीं चाहिए 3. स्वर्ग के सुख भी नहीं चाहिए। इस तरह उसने तो पहले ही स्पष्ट कर दिया कि उसमें फल की इच्छा नहीं है। उसके हृदय में पहली उलझन यह है कि राज्य का सुख भोगने के लिए इतना बड़ा नरसंहार क्यों करें ? दूसरी उलझन यह कि भीष्म पितामह,गुरू द्रोण पर प्रहार कैसे करे ? यह तो अनीति है तीसरा असमंजस यह कि चाहे चचेरे ही सही किंतु कौरव हैं तो मेरे भाइ्र ; राज्य के लिए उनकी हत्या क्यों करे ? चौथी शंका यह कि युद्ध में हम उनको मारेंगे या वे ही हमें मारेंगे। विजय किसकी होगी ? यह निश्चित नहीं। तो अनिश्चित परिणाम के लिए लक्षाधिक लोगों को क्यों मारा जाए ? और पांचवीं चिंता यह कि इतनी हत्याओं का पाप मेरे को भोगना होगा। अनेकानेक स्त्रियों को विधवा कर देने एवं बच्चों को अनाथ कर देने का दोष मुझे लगेगा।
ते यह सब मेरा कर्तव्य कैसे हो सकता है ? मेरा क्षत्रिय धर्म कैसे हो सकता है ? तब कृष्ण उसे मनुष्य शरीर में खुद के अवतारी उद्देश्य से अवगत कराते हैं – परित्राणाय साधुनाम्, विनाशाय च दुष्क्रताम!, धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। समझाया है कि व्यक्तिगत सुख के लिए किया गया कार्य कामना है किंतु सम्पूर्ण समाज की भलाइ्र के लिए कार्य उद्देश्य हो जाता है, धर्म हो जाता है ; फिर वह कामना, इच्छा नहीं रहता । इस कारण कर्मफल उसे नहीं बांधता।
इसके बाद 11 वें अध्याय में स्वयं का विराट रूप दिखाया। उसमें अर्जुन ने देखा कि सारी सेना महाकाल के मुंह में जा रही है। इस से समझाया कि कोइ्र किसी को नहीं मारता है। सब को काल ही मारता है। मनुष्य या घटनाएं या परिस्थितिया ंतो केवल बहाना या निमित्त बन जाती हैं।
यह सारी बात उपर्युक्त श्लोक की पृष्ठभूमि में है। इसे ध्यान में रखते हुए उक्त श्लोक का अर्थ इस तरह होगा – रणक्षेत्र में खड़े रह कर तू किसी
भी तरह की उलझन, असमंजस, चिंता, भय आदि की बात मत कर। इस समय प्रजा की रक्षा करने, र्धम का उत्थान करने, अन्याय का विरोध करने और दुष्टों का नाश करने के लिए युद्ध (धर्म कर्म) करना ही तेरे अधिकार में है। अतः जो तेरे अधिकार में है वह अवश्य कर। (अभिप्राय – शुभ कर्म का फल अवश्य ही श्ुाभ होता है । धर्म का परिणाम भी धर्म ही होता है। कल्याणकारी कर्म का फल अकल्याणकारी नहीं होता है)।
त्ूा अपना कर्म इस तरह मत कर कि वह कर्मफल भुगताने के लिए तेरा पुनर्जन्म करा दे। इसलिए कर्तव्य भाव में स्थिर रहते हुए कर्म कर। यदि तू विजय पराजय, नीति अनीति, मोह, पाप आदि की उलझन में रहते हुए कर्म करेगा तो कर्मफल तेरे को बांध लेगा और तेरा पुनर्जन्म करायेगा। इसलिए भगवान ने कहा – तू कर्मफल भोगने का खुद ही कारण मत बन। …आगे चेताया कि परिणाम की अनिश्चितता से डर कर तू अकर्मण्य मत बन- युद्ध नहीं करूंगा, ऐसा मत कह । क्यों कि जो कर्तव्य कार्य तेरे को परिस्थितियों द्वारा सौंपा गया है उसे नहीं करना भी कर्म दोष है तथा उसका बुरा फल अवश्य भोगना पड़ता है।
श्रीकृष्ण ने गीता में तीन बार अर्जुन को चेताया है कि उठो, अपना कर्तव्य कर्म करो। फिर अठारहवें अध्याय के 59 में भगवान उसे पुनः सचेत करते हैं कि – तू यदि किसी भी कारण से कहता है मै युद्ध नहीं करूंगा तो यह तेरा अहंकार है। तेरा क्ष्त्रिय स्वभाव अंततः तुझे युद्ध में लगा देगा।तेरे पूर्व कर्मों से बना हुआ तेरा स्वभाव तेरे को युद्ध करने के लिए विवश कर देगा – क्यों कि प्रत्येक मनुष्य स्वयं के जन्मजात स्वभाव के अनुसार कर्म करने के लिए विवश होता है (इसी अध्याय का 60 वां श्लोक)।
इस श्लोक का अर्थ अठारहवें अध्याय के 73 0ें ष्लोक के साथ पूरा होता है। ष्हीं अर्जुन कहता है कि मै युद्ध के लिए तैयार हूं। अपना कर्तव्य कर्म करूंगा। उसने कहा – आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है ,पितामह भीष्म, गुरू द्रोण, अपने ही चचेरे भाईयों को युद्ध में कैसे मारूं, यह मोह मिट गया है। मेरे को अपनी सनातन स्मृति वापस प्राप्त हो गई है – यह कि मै देह नहीं आत्मा हूं। मै अनश्वर हूं। मेरा अपनी और इन सब की देह के साथ कोई स्थायी संबंध नहीं है। …मेरी बुद्धि स्थिर हो गई है – जय पराजय, जन्म मरण का द्वंद्व मिट गया है। मेरे सारे संदेह समाप्त हो गए हैं – इतने येद्धाओं को मारने का पापा भोगना पड़ेगा, यह डर भी दूर हो गया है। मै जान गया हूं कि सब को काल ही मारता है, मनुष्य या बीमारी या दुर्घना तो निमित्त हैं। इसलिए अब मै आपकी आज्ञानुसार युद्ध कर्म का निर्वाह करने के लिए तत्पर हूं।