स्वामिभक्त दूधा

मनोहरसिंह चौहान

जरूरी    न    था   रोटी   लाना।

जो   हाथ   यूं   कटवा   आया।।
एक  दिन  अगर  मैं  नहीं खाता,
मुझको   राम   रखता    भाया।।
देख   दशा   भील   बालक  की,
राणा   का    हृदय   भर  आया।
मैं   केसे   ऋण  मुक्त   होऊंगा,
तेने  जो  कर्ज  मुझ  पर ढ़ाया।।
प्रताप   को    दुश्मन    घेरे    थे,
तब  भील  का   ही  सहारा  था।
खान  पान   और    रक्षा  करना,
भीलो   ने    ही   स्वीकारा  था।।
राणा   और   भीलों    के   बीच,
मुगलों   ने    डाला    डेरा    था।
राणा   तक    रसद   ना   पहुंचे,
अरि   का   पहरा   घनेरा   था।।
बारी      बारी      देंगे     भोजन,
हर   भील   की   बलिहारी  थी।
स्वतंत्र     हो     मेवाड़    हमारा,
ये   राणा   की   स्वीकारी   थी।।
दूधा   को    मां    ने    रोटी    दे,
राणा     के     थान     पहुंचाया।
राह     में     मुगलों    ने     घेरा,
दूधा   न   उनके   हाथ  आया।।
भागे     दूधा    पर    वार    कर,
सैनिक   ने   हाथ   काट   दिया।
दूधा   भागा   रुका   लक्ष्य   पर,
होकर  घायल  पथ पार  किया।।
लथपथ  दूधा   गिरा  भूमि   पर,
राणा जी   बस  कह  पाया  था।
थी   हाथ   रोटी    की    पोटली,
वह   देकर   मुक्ति   पाया  था।।
जाने    कितने   यूं   देश   भक्त।
मातृभूमि   पर   बलिदान  हुए।।
जिनका  लेखन नही  कर  पाए,
न उनके अबतक गुणगान हुए।।
***
गीतकार मनोहरसिंह चौहान मधुकर
जावरा जिला रतलाम मध्य प्रदेश
मोबाईल नंबर 09131436100
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