शम्मी कयूर ने चार चार नई अभिनेत्रियों के साथ काम किया। जो बाद में फिल्मी दुनिया में सफल अभिनेत्रियां बन कर उभरीं//

साथियो फिल्मी दुनिया में कोई स्थापित अभिनेता बिल्कुल नई अभिनेत्री के साथ काम करने से कतराता है। यहां तक की फिल्म ही छोड़ देता है। ऐसी अनगिनत घटनाएं हुई हैं कि इस फिल्म में पहले अमुक हीरो था उस फिल्म की पहली पसंद फला हीरो नहीं था। बाद में किसी दूसरे हीरो ने वह रोल किया। इस तरह की हजार बातें फिल्मी दुनिया का एक अभिन्न हिस्सा है। कई नई अभिनेत्रियों के साथ कोई स्थापित हीरो झटपट काम करने को तैयार नहीं होता। यहां यह सामान्य बात है मगर शम्मी कपूर वाहिद ऐसे हीरो रहे जिन्होंने एक नहीं बल्कि चार नवागत हिरोइनों के साथ काम किया और न केवल खुद बल्कि चारों अभिनेत्रियों ने भी नाम कमाया सफलता प्राप्त की। ये हैं अमिता, आशा पारिख, सायरा बानो और
शर्मीला टैगोर।
शम्मी कपूर की पहली सफल फिल्म ‘तुमसा नहीं देखा’ देवानंद ने नई हिरोइन अमिता के साथ काम न करने की वजह से ही वह फिल्म उन्हें मिली और इसी फिल्म से उन्होंने पहली बार सफलता का स्वाद चखा था। सन् 1959 में फिर एक नई हिरोइन आशा पारिख के साथ उन्होंने फिल्म ‘दिल देके देखो ‘में काम किया। उल्लेखनीय है दिल देके देखो बतौर हिरोइन बेशक पहली फिल्म थी पर आशा पारिख वाल कलाकार के रूप मे पर्दे पर सन् 1952 मे फिल्म ‘मां’ में काम कर चुकी थी। इसके अलावा ‘आसमान’ तथा ‘धोबी डाक्टर’ नाम की फिल्म में बाल कलाकार की हैसियत से काम कर चुकी थी। तब आशा पारिख 10-11 वर्ष की थी।
फिर और एक नई अभिनेत्री शर्मीला टैगोर के साथ शम्मी कयूर ने फिल्म ‘कश्मीर की कली’ नाम की फिल्म में काम किया। इस फिल्म ने अपने समय में सफलता के खूब झंडे गाड़े इसके लिए इस फिल्म के बेहतरीन गानों का बड़ा हाथ रहा। फिल्म के गाने आज भी तरोताजा हैं। बैठकों-महफिलों की जान और शान हैं। यहां यह भी बताता चलूं कि ‘कश्मीर की कली’ भी शर्मीला टैगोर की बतौर हिंदी की पहली फिल्म थी। जबकि शर्मीला टैगोर ने सन् 1959 में विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय के निर्देशन में बांग्ला फिल्म ‘अपूर संसार’ में काम करके अभिनय की दुनिया में कदम रख चुकी थी। इसके बाद 1960 में ‘देवी’और 1961 में ‘तीन कन्या’ नामक बांग्ला फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम कर बांग्ला अभिनय की दुनिया में अच्छा नाम बना चुकी थी। शर्मीला टैगोर की ऊपर वर्णित तीनों फिल्मों के निर्देशक सत्यजीत राय थै।
फिर सन् 1961 में एक बार फिर से उन्हें सायरा बानू के साथ एक फिल्म ‘जंगली’ का प्रस्ताव मिला। सायरा बानो की भी यह पहली फिल्म थी। उनकी मां नसीम बानू हिंदी फिल्म की पहली महिला सुपर स्टार कही जाती है। सुंदर इतनी की परी चेहरा कहलाती थीं। जंगली के टाइटल गीत ने देशभर मेंजंगली और याहू शब्द हर जबान यर चिपक सा गया था। की लोगों को लगता होगाकि इस फिल्म के शीर्षक गीत – चाहे कोई मुझे जंगली कहे …. में “याहू…” कहकर चिल्लाने की आवाज गायक मोहम्मद रफी जी की है। जी नहीं पद्दति रफी जी इस तरह चिल्लाए तो गाना उस तरह से गाया नहीं जाएगा जिस तरह हम सुनते आ रहे हैं। फिर उस याहू की आवाज किसकी है। बता रहा हूं भाई … गाने में ‘याहू…’ चिल्लाने की आवाज पटकथा लेखक, निर्देशक , गीतकार प्रयाग राज की है। जंगली ही नहीं इसके अलावा और भी कई गीतों में तरह तरह आवाजें निकालकर गीतों की सुंदरता बढ़ाई है। उसकी चर्चा फिर कभी। अभी करने बैठूंगा तो किस्सा बहुत लंबा हो जाएगा। फिलहाल, अब विदा लेने का समय हो गया. .. धन्यवाद-आभार स्वीकार करें… खतम, टा टा, बाय बाय….
श्याम कुमार राई
“सलुवावाला”