मांगलिक कार्यो को आरंभ करने का अबूझ मुहूर्त है -अक्षय तृतीया

परशुराम जयन्ती भी मनायी जाती है धूमधाम से

ऐसा दिन जिसका सभी बेसर्बी से इंतजार करते है वह है – अक्षय तृतीया का दिन। यही ऐसा अबूझ मुहूर्त है जिसमें हर सामान्य नागरिक अपने शुभ कार्य निपटाना चाहता है। इस दिन से ब्याह-परिणय करने का आरम्भ हो जाता है। बड़े-वृद्ध अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरम्भ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति-परम्पराओं के साथ अपने गुड्डा-गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बाल-बालिकाओं सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई स्थान पर तो परिवार के साथ-साथ पूरा का पूरा गाँव भी बालक-बालिकाओं के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्र होकर आने वाले वर्ष के आगमन  कृषि उपज आदि के शगुन देखते हैं। इस दिन को लेकर मान्यता है कि भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान श्री परशुराम जी का जन्म हुआ था। इस दिन को भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है ।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया को शुभ माना जाता है । इस अबूझ मुहूर्त पर लोग सोना चांदी और नया सामान खरीदते है । हिंदू धर्म में इस दिन पूजा पाठ का भी विशेष लाभ मिलता है । इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के पावन दिन ही मां गंगा का धरती पर आगमन हुआ था और इस दिन ही युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण ने अक्षय पात्र दिया था, जिसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था और इसी पात्र से युधिष्ठिर अपने जरूरतमंद लोगों को भोजन करवाते थे । इसीलिए अक्षय तृतीया के दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। अक्षय तृतीया के दिन त्रोता युग का आरंभ हुआ था । इस दिन गंगा का अवतरण भी धरती पर हुआ था । इसीलिए अक्षय तृतीया के दिन को साल का सबसे शुभ मुहूर्त माना जाता है और लोग इस दिन शुभ कार्य करने के लिए पूरे साल इस दिन का इंतजार करते हैं। अक्षय तृतीया को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। अक्षय तृतीया का पर्व प्रत्येक वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।
मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप द्वारा भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आराधना करने से इनकी कृपा विशेष रूप से भक्तों पर बरसती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर जल अनाज गन्ना सत्तू सुराही हाथ से बने पंखें आदि का दान करने से विशेष फल मिलता है। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन हम जो भी कार्य करते उसमें हमें अक्षय फल की प्राप्ति होती है और वह पुण्य कभी समाप्त नहीं होता। शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह गृहप्रवेश व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। मान्यता के अनुसार इस शुभ दिन नमक का दान करने से पितरों को खुशी मिलती है। इससे वह हमारे जीवन के सभी परेशानियों को दूर करते हैं। इसलिए अक्षय तृतीया पर नमक खरीदा जाता है। कहा जाता है कि नमक का दान करने से पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।
अक्षय तृतीया पर सोने या चांदी से बने आभूषण भूमि भवन वाहन बर्तन मशीनरी सामान फर्नीचर कपड़े आदि खरीदना शुभ होता है। इस दिन नए कार्य की शुरुआत करने से उसमें सफलता प्राप्त होती है। वहीं मूल्यवान चीजों की खरीदी करने पर लंबे समय तक वह शुभ फल प्रदान करती है। इस दिन सबसे पहले गणेश जी की पूजा में अक्षत सिंदूर चंदन दूर्वा पान सुपारी नारियल धूप दीप फूल फल मोदक आदि अर्पित कर पूजा के दौरान भगवान विष्णु को चंदन फूल अगरबत्ती और तुलसी और देवी लक्ष्मी को कुमकुम अक्षत कमल का फूल गुलाब का फूल कमलगट्टा माला हल्दी धूप दीप नैवैद्य चढ़ाया जाता है। घर पर दूध चावल या दाल जैसी सामग्री से भोग (नैवेद्य) तैयार कर इसे देवताओं को अर्पित किया जाता है।
इस दिन समुद्र या गंगा स्नान करना श्रेष्ठ है।  प्रातः पंखा चावल नमक घी शक्कर साग इमली फल तथा वस्त्र का दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनी चाहिए।  ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए। हालांकि इस दिन प्लास्टिक एल्युमिनियम या स्टील के बर्तन नहीं खरीदना चाहिए। माना जाता है कि इससे राहु का प्रभाव बढ़ता है और घर में दरिद्रता आती है। अक्षय तृतीया का दिन बहुत शुभ होता है और मां लक्ष्मी को समर्पित होता है। इस दिन नमक प्याज लहसुन मांस-मदिरा का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
अक्षय तृतीया पर ऐसा कहा जाता है कि कुबेर (धन के देवता और सभी देवताओं के कोषाध्यक्ष) ने देवी लक्ष्मी की पूजा की जिसने बदले में उन्हें शाश्वत धन और समृद्धि दी। इस प्रकार विवाह करने से समृद्धि सुनिश्चित होती है। इस दिन देवी मधुरा ने भगवान सुंदरेसा (भगवान शिव के अवतार) से विवाह किया था। ज्योतिषियों के अनुसार सोना खरीदना शुभ रहता है लेकिन यदि कोई सोना खरीदने में सक्षम नहीं हैं तो वे पीली सरसों या जौ खरीदकर मां लक्ष्मी की कृपा पा सकते हैं। देवी लक्ष्मी की पूजा में पीली सरसों और जौ का उपयोग किया जाता है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन भी बहुत शुभ माना जाता है।
प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। यह दिन जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर श्री आदिनाथ भगवान ने सत्य व अहिंसा का प्रचार करने एवं अपने कर्म बन्धनों को तोड़ने के लिए संसार के भौतिक एवं पारिवारिक सुखों का त्याग कर जैन वैराग्य अंगीकार कर लिया। सत्य और अहिंसा के प्रचार करते-करते आदिनाथ प्रभु हस्तिनापुर गजपुर पधारे जहाँ इनके पौत्र सोमयश का शासन था। प्रभु का आगमन सुनकर सम्पूर्ण नगर दर्शनार्थ उमड़ पड़ा सोमप्रभु के पुत्र राजकुमार श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखकर उसने आदिनाथ को पहचान लिया और तत्काल शुद्ध आहार के रूप में प्रभु को गन्ने का रस दिया, जिससे आदिनाथ ने व्रत का पारायण किया। जैन धर्मावलंबियों का मानना है कि गन्ने के रस को इक्षुरस भी कहते हैं इस कारण यह दिन इक्षु तृतीया एवं अक्षय तृतीया के नाम से विख्यात हो गया।
विभिन्न प्रांतों में भी अक्षय तृतीया का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। बुन्देलखण्ड में अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक उत्सव मनाया जाता है । जिसमें कुँवारी कन्याएँ अपने भाई पिता तथा गाँव-घर और कुटुम्ब के लोगों को शगुन बाँटती हैं और गीत गाती हैं। अक्षय तृतीया को राजस्थान में वर्षा के लिए शगुन निकाला जाता है। वर्षा की कामना की जाती है । लड़कियाँ झुण्ड बनाकर घर-घर जाकर शगुन गीत गाती हैं और लड़के पतंग उड़ाते हैं। यहाँ इस दिन सात तरह के अन्नों से पूजा की जाती है। मालवा में नए घड़े के ऊपर खरबूजा और आम के पल्लव रख कर पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन कृषि कार्य का आरम्भ किसानों को समृद्धि देता है।
प्रचलित कथाओं में स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयन्ती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयन्ती को विशेष महत्त्व दिया जाता है। परशुराम जयन्ती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और कुंवारी कन्याएँ इस दिन गौरी-पूजा करके मिठाई फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं । गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल फल फूल तिल अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के उपरान्त प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद परिवर्तित कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने पर भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक परशु रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।
इस वर्ष अक्षय तृतीया पूजा 19 अप्रैल 2026 रविवार को मनाई जाएगी। द्रिक पंचांग के अनुसार इस दिन का मुहूर्त सुबह 10 बजकर 49 बजे से 11 बजकर 36 बजे तक रहेगा । तृतीया तिथि 19 अप्रैल, 2026 को सुबह 10 बजकर 49 बजे से शुरू होकर 20 अप्रैल 2026 को सुबह 7 बजकर 27 बजे समाप्त होगी।
अक्षय तृतीया पर अबूझ सावा होने के कारण प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी नाबालिग बच्चों को विवाह करा दिया जाता है। जो एक कुरीति है। इसकी रोकथाम के लिए प्रशासन सतर्क रहता है तथा समझाईश के माध्यम से ऐसी प्रथा को रोकने तथा बाल विवाह नहीं हो इसके लिए लोगों एवं प्रबुद्धजनों को पाबंद भी करता है।

-श्रीमती सन्तोष शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार

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