ममता मरकर भी नहीं मरती

जब साँसों का धागा टूट गया,
तन का हर बंधन छूट गया।
जब हाथों की ताकत हार गई,
जीवन की नैया पार गई।
जब देह ने रिश्ता तोड़ दिया,
हर नस ने चलना छोड़ दिया।
तब भी देखो यह ममता थी,
सीने से चिपकी जन्नत थी।
मृत्यु जहाँ सब हर लेती है,
माँ बाँहों में भर लेती है।
तन मिट्टी होकर सो जाता,
पर प्रेम अमर हो रह जाता।
हाथों में फिर बल कहाँ रहा,
फिर भी आँचल क्यों तना रहा।
यह देह नहीं, यह माया है,
माँ प्रेम स्वयं की छाया है।
मरकर भी जिसने थाम लिया,
संतान को सीने थाम लिया।
दुनिया का हर संबंध ढले,
माँ के बंधन कब हैं छले।
मृत्यु भी हारी उस पल में,
ममता जीवित थी आँचल में।
जिस तन ने जीवन त्याग दिया,
उस मन ने बच्चा बाँध लिया।
सच है जग में बस एक बात
माँ मरती है, ममता नहीं साथ।

डॉ मधु खंडेलवाल अजमेर

error: Content is protected !!