जंतर मंतर पर युवाओं का अहिंसक आक्रोश, आदेशों की अनुपालना में लाठियों का प्रहार, सत्ता का ढहता मद, प्रधान चेहरों की सघन सलवटें, संसद का शोर और सड़क का आह्वान.. महज मंत्री के इस्तीफे की माँग या पेपर लीक की तात्कालिक प्रतीकात्मकता वजह भले ही रही हो, लेकिन इसके मूल में लंबे समय से अनिश्चित भविष्य को लेकर इकठ्ठा हुआ डर था। जरूरी नहीं यह डर युवाओ के मन में था। यह उन अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के मन में भी था जो किन्हीं कारणों से उसे अन्यत्र अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे।
यही वजह है कि इस आंदोलन का ना अपना कोई चेहरा था , ना पहचाना नेतृत्व और ना ही दिशा निर्देश देता कोई प्रायोजित प्रचार.. यहां तक कि संगठित विपक्ष या और मीडिया भी आंखे चुराकर एक कोने में खड़े थे। सत्ता तंत्र और उसके अनन्य अनुयायी तो इसे देश द्रोह और धर्म द्रोह से जोड़कर भी देख रहे थे।
बारीकी से देखे तो युवाओं के अनिश्चित भविष्य के साथ-साथ शिक्षा का अवमूल्यन, संस्थाओं का दुरुपयोग, डर का साम्राज्य की भीतर ही भीतर छोटी छोटी सुलगती चिंगारी अचानक एक हवा के दबाब से आग में बदल गई। सत्ता तंत्र का रवैया आग को पानी की जगह पेट्रोल मुहैया करवा गया। सुयोग रहा कि गांधी के अहिंसक मूल्यों ने उस आग को दावानल बनने से रोक लिया।
सवाल आंदोलन के सफल, असफल या और माँगो के माने जाने से अधिक नहीं है उस डर के निकल जाने का जो जनता की शिराओं में देश भक्ति के नाम पर घोला जा रहा था और उस डर का भी जो सत्ताधीश अपने मुखौटों में छिपाकर अट्टहास करते घूम रहे थे। कुल मिलाकर आंदोलन की सफलता या उपलब्धि डर के बाँध का टूट जाना भर है।
अखबारों की तस्वीरें उन सारे तर्कों का जवाब दे रही है, जिन्हें लगता है अच्छे दिन आ गए। यह अलग बात है कि पट्टी बंधी आँखों को उन तस्वीरों में अपने बच्चों की सूरत दिखाई नहीं दे रही है
दुष्यंत का यहयाद आता है-
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है
रास बिहारी गौड़