
सुप्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार स्व. गोपाल सिंह नेपाली का आज जन्म दिन है। आज ११ अगस्त १९११ के दिन बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बेतिया में उनका जन्म हुआ था।चूंकि उनका जन्म जन्माष्टमी के दिन हुआ था इसलिए पिता रेल बहादुर ने इनका नाम गोपाल रखा, गोपाल बहादुर सिंह। बाद में इन्होंने अपना नाम गोपाल सिंह नेपाली रख लिया।
उनकी कई रचनाएं हिंदी साहित्य की धरोहर हैं। उनकी ‘कलम’ पर लिखी महत्वपूर्ण कविता की पंक्तियां किसी को भी झकझोरने की ताकत रखता है। वे लिखते हैं —
“तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आंसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम”
एक और कविता ‘हिमालय और हम’ में भारतवासियों और हिमालय के संबंध को बड़े सारगर्भित तरीके से बताया है। उन्होंने हिमालय से निकलने वाली गंगा नदी को पवित्र और दुखों का नाश करने वाली बताया है।
वे अपने समय में कविता मंचों की शान हुआ करते थे। एक समय की बात है। जब कवि गोष्ठी के मंच पर उनकी कविता सुनकर महान हिंदी कथा- लेखक प्रेमचंद जी ने कहा था, “गोपाल जी क्या आप कविताई मां के पेट से सीख कर आए हैं।” नेपाली जी के लिए इससे बढ़कर पुरस्कार तथा प्रशंसा के बोल और क्या हो सकते थे!
इतना ही नहीं नेपाली जी ने हिंदी फिल्मों भी ढेरों गीत लिखे। वे सन् 1940 से 1963 तक फिल्मी गीत लेखन में सक्रिय रहे। इस अवधि में निर्मित सभी धार्मिक फिल्मों के लगभग सारे गीत उनके ही लिखे होते थे। जो उन दिनों बेहद चर्चित और लोकप्रिय भी हुए। सन् १९५७ में प्रदर्शित फिल्म ‘नरसी भगत’ का अत्यधिक लोकप्रिय भजन “दर्शन दो घनश्याम मोरी अंखियां प्यासी रे… यह भी कवि गोपाल सिंह ‘नेपाली’ का लिखा हुआ है।सन् 1940 से लेकर 1963 तक 60 से अधिक हिंदी फिल्मों 400 गाने लिखे। उन्होंने ‘हिमालय फिल्म्स’ और ‘नेपाली पिक्चर्स’ नाम से अपनी प्रोडक्शन कंपनीके झंडे तले ‘नजराना’ ‘सनसनी’ और खुशबू नाम की तीन फिल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। इसके अलावा
हिंदी गीतों-कविताओं के रचयिता नेपाली जी ने ने कुछ पत्रिकाओं — ‘रतलाम टाइम्स’ , दिल्ली से निकलने वाली चित्रपट,साप्ताहिक जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादन और संपादन विभाग से जुड़कर वर्षों काम किया था।
एक साहित्यिक पत्रिका ‘सुधा’ जो लखनऊ से प्रकाशित होती थी, इसके संपादन विभाग में उन्होंने स्वनामधन्य कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी के साथ भी काम किया था।
अफसोस, नेपाली जी महज ५३ वर्ष की अल्पायु में १७ अप्रैल १९६३ के दिन इस फानी दुनिया को छोड़ चले गए।
उनकी साहित्यिक कृत्यों की स्मृति को अक्षुण्ण रखने एवं श्रद्धांजलि स्वरूप बिहार में उनके जन्म स्थान बेतिया में एक सड़क का नाम ‘गोपाल सिंह नेपाली पथ’ रखा गया है। साथ ही आज के दिन बिहार में जगह-जगह पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित किए जाते है। आज उनकी ११६ वीं जयंती पर इन पंक्तियों का लेखक, मैं उन्हें विनम्र हार्दिक नमन अर्पित करता हूं।
और …और जगत भर में बसे समस्त गोरखालियों-नेपालियों की ओर से कवि गोपाल सिंह नेपाली जी को श्रद्धा सुमन एवं हार्दिक श्रद्धांजलि भी अर्पित करता हूं।
जय हिंद
“जय गोरखा”।
— श्याम कुमार राई
‘ सलुवावाला’