आजाद देश में आजादी के अधूरे सवाल

बाबूलाल नागा

      15 अगस्त हमारे लिए केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। 1947 में देश ने औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई थी। आज हम स्वतंत्र भारत की 80वीं स्वतंत्रता वर्षगांठ की ओर बढ़ रहे हैं। इन वर्षों में देश ने विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, कृषि, उद्योग, सड़क, संचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। दुनिया में भारत की पहचान एक तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था और बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में बनी है।

बाबूलाल नागा

लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है-क्या राजनीतिक आजादी का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक स्वतंत्रता के रूप में पहुंच पाया है?     कहने को हम सभी आजाद हैं। हमारे पास संविधान है, मतदान का अधिकार है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और कानून की नजर में समानता का अधिकार है। लेकिन जमीन पर तस्वीर हमेशा इतनी उजली नहीं दिखाई देती। कई बार ऐसा लगता है कि हम सब आजाद तो हैं, लेकिन कुछ लोग हमसे अधिक आजाद हैं, हम सब बराबर हैं, लेकिन कुछ लोग हमसे अधिक बराबर हैं।

   आजादी का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। आजादी का अर्थ है-भूख से मुक्ति, भय से मुक्ति, भेदभाव से मुक्ति, अशिक्षा से मुक्ति, बेरोजगारी से मुक्ति और उस व्यवस्था से मुक्ति जिसमें किसी व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति से तय होती है।

   आज भी देश में ऐसे परिवार हैं जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे मजदूर हैं जो सुबह घर से निकलकर काम की तलाश में भटकते हैं। ऐसे बच्चे हैं जिनके हाथों में किताबों की जगह मजदूरी का बोझ है। ऐसे परिवार हैं जिनके पास पक्का घर नहीं, स्वच्छ पेयजल नहीं और बीमारी की स्थिति में बेहतर इलाज का भरोसा नहीं।

   दूसरी ओर विकास के बड़े-बड़े आंकड़े, आर्थिक वृद्धि की दर, आधुनिक शहरों की चमक और डिजिटल भारत की तस्वीर हमें दिखाई देती है। यह विरोधाभास हमें सोचने पर मजबूर करता है कि विकास आखिर किसके लिए और किस कीमत पर हो रहा है?

   क्या हर नागरिक अपनी पसंद का भरपेट भोजन कर सकता है? क्या हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या हर युवा को सम्मानजनक रोजगार का अवसर उपलब्ध है? क्या हर परिवार के पास सुरक्षित आवास और स्वच्छ पानी है? क्या गरीब व्यक्ति बिना आर्थिक चिंता के इलाज करा सकता है? क्या महिलाओं को बिना भय और भेदभाव के स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार वास्तव में मिल पाया है?

   और सबसे महत्वपूर्ण सवाल-क्या दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और समाज के कमजोर वर्ग अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल समान आत्मविश्वास के साथ कर पा रहे हैं?

   यदि इन सवालों का जवाब पूरी तरह हां नहीं है, तो हमें अपनी आजादी के अर्थ पर फिर से विचार करना होगा।

   हमारे सामने आज भी कई ऐसी बेडि़यां हैं जो दिखाई नहीं देतीं। जातिवाद, छुआछूत, धार्मिक कट्टरता, लैंगिक भेदभाव, आर्थिक असमानता, अंधविश्वास, अशिक्षा और सामाजिक पूर्वाग्रह ऐसी ही बेडि़यां हैं। कानून ने छुआछूत को अपराध घोषित कर दिया, लेकिन क्या हमारे व्यवहार से छुआछूत पूरी तरह खत्म हो गई? संविधान ने समानता का अधिकार दिया, लेकिन क्या समाज ने समानता को अपने व्यवहार का हिस्सा बना लिया?

   आज धर्म और मजहब के नाम पर बढ़ती नफरत भी हमारे लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चुनौती है। सोशल मीडिया के दौर में अफवाह और नफरत कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुंच जाती है। असहमति को दुश्मनी समझना और सवाल पूछने वाले को विरोधी मान लेना लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती।

   भारत का संविधान हमें केवल अधिकार नहीं देता, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के मूल्यों पर आधारित समाज बनाने का रास्ता भी दिखाता है। इसलिए आजादी का उत्सव तभी सार्थक होगा, जब ये मूल्य हमारी किताबों और भाषणों से निकलकर हमारे व्यवहार में दिखाई देंगे।

   लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार मतदान करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है कि नागरिक सवाल पूछ सके, सरकार जवाब दे, संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करें और सत्ता में बैठे लोग जनता के प्रति जवाबदेह रहें। विरोध और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत हैं।

   देश के प्राकृतिक संसाधन-जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और नदियां-केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं। ये आने वाली पीढि़यों की विरासत हैं। विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण, स्थानीय समुदायों और भविष्य की पीढि़यों के अधिकारों की कीमत पर न हो।

   आजादी के इतने वर्षों बाद हमें यह भी तय करना होगा कि विकास का मॉडल कैसा हो। क्या विकास का मतलब केवल बड़े उद्योग, चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें और आर्थिक आंकड़े हैं?    या विकास का मतलब यह भी है कि गांव का किसान सम्मान से जी सके, मजदूर को उचित मजदूरी मिले, युवा को रोजगार मिले, बच्चा अच्छी शिक्षा पाए और बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए अपना घर न बेचना पड़े?

   सच्ची आजादी तभी होगी जब किसी गरीब को भूख के कारण अपने बच्चे के भविष्य से समझौता न करना पड़े। जब किसी बेटी को अपनी सुरक्षा के लिए अपनी आजादी सीमित न करनी पड़े। जब किसी व्यक्ति को अपनी जाति या धर्म के कारण अपमानित न होना पड़े। जब किसी आदिवासी को अपने जल-जंगल-जमीन के अधिकार के लिए संघर्ष न करना पड़े। जब कोई नागरिक सरकार से सवाल पूछने में भय महसूस न करे।

   इसलिए 15 अगस्त केवल झंडा फहराने, राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के नारे लगाने का दिन नहीं है। यह दिन हमें यह पूछने का भी अवसर देता है कि जिस भारत का सपना स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था, क्या हम उस भारत की ओर बढ़ रहे हैं?

    आज जरूरत किसी एक सरकार, एक राजनीतिक दल या किसी एक व्यक्ति को दोष देने से अधिक अपने भीतर झांकने की है। सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे न्यायपूर्ण और समान नीतियां बनाएं तथा संविधान की भावना के अनुरूप शासन करें। लेकिन नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे भेदभाव का विरोध करें, नफरत को अस्वीकार करें, लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करें और अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें।

    आजादी का अर्थ केवल यह नहीं कि देश पर किसी विदेशी का शासन नहीं है। आजादी का अर्थ यह भी है कि देश का हर नागरिक सम्मान, समानता और गरिमा के साथ जीवन जी सके।

    जिस दिन भूख, भय, भेदभाव और अन्याय से मुक्ति आम नागरिक की जिंदगी का हिस्सा बन जाएगी, उस दिन हमारी राजनीतिक आजादी सामाजिक और आर्थिक आजादी में भी बदल जाएगी। तब हम पूरे विश्वास के साथ कह सकेंगे-हां, हम सचमुच आजाद हैं।

(लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं) 

संपर्क:वार्ड नंबर 1, जोबनेर, जिला-जयपुर (राजस्थान) मोबाइल: 9829165513

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