सरदार पटेलः नये भारत के शिल्पकार और स्वप्नद्रष्टा युगपुरुष

राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष: 31 अक्टूबर 2026 पर विशेषः

किसी राष्ट्र का निर्माण केवल स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने से नहीं होता, बल्कि स्वतंत्रता को एकता, अखंडता, सुरक्षा और सामूहिक संकल्प की शक्ति में बदलने से होता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद यह सबसे बड़ी चुनौती थी। देश के सामने रियासतों का बिखराव था, विभाजन की पीड़ा थी, सांप्रदायिक तनाव था, सीमाओं पर असुरक्षा थी और नवजात लोकतंत्र के सामने अनेक राजनीतिक एवं प्रशासनिक संकट थे। ऐसे कठिन समय में यदि किसी एक व्यक्तित्व ने भारत को भौगोलिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और राष्ट्रीय दृष्टि से एक सूत्र में पिरोने का ऐतिहासिक दायित्व निभाया, तो वे थे सरदार वल्लभभाई पटेल। उनकी 151वीं जयंती पर मनाया जाने वाला राष्ट्रीय एकता दिवस केवल एक महापुरुष का स्मरण नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक शक्ति, राष्ट्रीय स्वाभिमान और दूरदर्शी नेतृत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का अवसर है। सरदार पटेल का व्यक्तित्व उस चट्टान की तरह था, जिस पर कठिन से कठिन परिस्थितियों की लहरें टकराकर लौट जाती थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी दृढ़ता, संगठन क्षमता और जन नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में विशिष्ट स्थान दिलाया था। खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली आंदोलन ने उन्हें किसानों के संघर्ष का नायक बनाया। बारडोली की महिलाओं द्वारा दिया गया ‘सरदार’ संबोधन आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की राष्ट्रीय पहचान बन गया। लेकिन उनकी वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका स्वतंत्रता के बाद सामने आई, जब भारत को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करना सबसे बड़ी आवश्यकता थी।
उस समय देश में 562 से अधिक रियासतें थीं। अनेक रियासतों के शासक स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने अथवा भारत से अलग रहने की आकांक्षा रखते थे। ऐसी स्थिति में भारत का राजनीतिक मानचित्र खंडित हो सकता था। सरदार पटेल ने अपनी राजनीतिक दृढ़ता, असाधारण कूटनीति और व्यावहारिक बुद्धिमत्ता से इस चुनौती का समाधान किया। उन्होंने जहां आवश्यकता हुई वहां संवाद का सहारा लिया, जहां जरूरी हुआ वहां दृढ़ता दिखाई और जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि था वहां किसी दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया। हैदराबाद का भारत में विलय इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। यह केवल रियासतों का विलय नहीं था, बल्कि एक आधुनिक राष्ट्र की आधारशिला रखने वाला ऐतिहासिक अभियान था। पटेल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे राजनीति को सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, राष्ट्र निर्माण का दायित्व मानते थे। उनके लिए राष्ट्रीय हित किसी दल, विचारधारा, क्षेत्र अथवा समुदाय से ऊपर था। वे जानते थे कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल भावनात्मक नारों से नहीं हो सकती। इसके लिए मजबूत प्रशासन, अनुशासित शासन, स्पष्ट विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा की ठोस व्यवस्था आवश्यक है। पाकिस्तान की नीतियों, कश्मीर के प्रश्न और सीमावर्ती क्षेत्रों की चुनौतियों को लेकर उनकी चिंताएं इसी राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टि का प्रमाण थीं। चीन की तिब्बत संबंधी नीति को लेकर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 7 नवंबर 1950 को लिखे पत्र में जिस प्रकार आगाह किया था, वह उनकी सामरिक दूरदृष्टि का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में सद्भावना के साथ-साथ सतर्कता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा को भी अनिवार्य माना।
सरदार पटेल की दूरदर्शिता का एक और महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण था। स्वतंत्रता के बाद अनेक लोग अंग्रेजों की बनाई प्रशासनिक सेवाओं को समाप्त करने के पक्ष में थे, लेकिन पटेल ने इनके महत्व को समझा। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा जैसी अखिल भारतीय सेवाओं को मजबूत आधार प्रदान किया। उनका मानना था कि देश की एकता और प्रशासनिक स्थिरता के लिए ऐसी संस्थाएं जरूरी हैं, जो राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाती रहें। उन्होंने अधिकारियों में यह विश्वास पैदा किया कि अब उनकी निष्ठा किसी विदेशी शासन के प्रति नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत और उसके नागरिकों के प्रति होनी चाहिए। इसीलिए उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का संरक्षक भी कहा जाता है। उनकी राजनीतिक दृष्टि में दृढ़ता थी, लेकिन वह हठधर्मिता नहीं थी। वे जानते थे कि राष्ट्र केवल कानून और प्रशासन से नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास और नागरिक उत्तरदायित्व से भी मजबूत होता है। वे राष्ट्रीय एकता को विविधताओं के निषेध के रूप में नहीं, बल्कि विविधताओं के बीच साझा राष्ट्रीय चेतना के विकास के रूप में देखते थे। भारत की भाषाएं, संस्कृतियां, परंपराएं और आस्थाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन राष्ट्र के प्रति निष्ठा और संविधान के प्रति सम्मान सबको एक सूत्र में बांधते हैं। आज जब समाज में वैचारिक मतभेद, क्षेत्रीय आग्रह, जातीय विभाजन और राजनीतिक कटुता की प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं, तब पटेल का यह संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
आज जब भारत वर्ष 2047 तक विकसित, आत्मनिर्भर, समृद्ध और विश्वशक्ति के रूप में स्थापित होने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, तब सरदार वल्लभभाई पटेल के विचार, दृष्टि और राष्ट्रनिर्माण की भावना पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठती है। उन्होंने जिस अखंड भारत की कल्पना की थी, उसकी मजबूती का आधार केवल भौगोलिक एकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकात्मता, सामाजिक समरसता, प्रशासनिक दृढ़ता और सामूहिक उत्तरदायित्व था। आज भारत के सामने आर्थिक प्रगति, तकनीकी आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता, आंतरिक सुरक्षा, सुशासन और वैश्विक नेतृत्व की जो चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ हैं, उनके समाधान में पटेल की राष्ट्रनिष्ठा, दृढ़ इच्छाशक्ति और व्यावहारिक नेतृत्व दृष्टि मार्गदर्शक बन सकती है। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश की विविधता उसकी शक्ति बने, राष्ट्रीय हित सर्वाेपरि रहे और प्रत्येक नागरिक राष्ट्रनिर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। इस दृष्टि से सरदार पटेल केवल इतिहास के महानायक नहीं, बल्कि 2047 के भारत की दिशा और दशा निर्धारित करने वाले प्रेरणास्रोत हैं।
सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व अदम्य साहस, लौह इच्छाशक्ति, अनुशासन, स्पष्टवादिता, संगठन क्षमता, प्रशासनिक दक्षता और अटूट राष्ट्रभक्ति का विलक्षण समन्वय था। वे दृढ़ संकल्प के धनी होने के साथ-साथ अत्यंत व्यावहारिक, दूरदर्शी और निर्णय लेने में असाधारण क्षमता रखने वाले राजनेता थे। वे केवल स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी या देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री ही नहीं थे, बल्कि ऐसे राष्ट्रशिल्पी थे जिन्होंने भारत की एकता और अखंडता को स्थायी आधार प्रदान किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि महान राष्ट्रों का निर्माण केवल संकल्पों से नहीं, बल्कि चरित्रबल, अनुशासन, कर्मनिष्ठा, त्याग और सामूहिक प्रतिबद्धता से होता है। यही वे शाश्वत गुण हैं, जिनकी आज के भारत और आने वाली पीढ़ियों को सर्वाधिक आवश्यकता है। आज भारत आर्थिक महाशक्ति बनने, वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। लेकिन विकास की इस यात्रा की सबसे बड़ी शर्त आंतरिक एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा है। आर्थिक समृद्धि तभी स्थायी हो सकती है, जब देश सामाजिक रूप से संगठित, राजनीतिक रूप से स्थिर और सामरिक रूप से सुदृढ़ हो। सरदार पटेल का जीवन हमें यही सिखाता है कि राष्ट्र की शक्ति उसके संसाधनों से अधिक उसके संकल्प, नेतृत्व और एकजुट नागरिक चेतना में निहित होती है।

सरदार पटेल का निधन 15 दिसंबर 1950 को हो गया, लेकिन उनका राष्ट्रवादी चिंतन आज भी भारत की राष्ट्रीय चेतना का आधार है। वर्ष 2018 में गुजरात में स्थापित उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ उनके विराट व्यक्तित्व और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान का प्रतीक है। किंतु उनकी वास्तविक स्मृति किसी प्रतिमा की ऊंचाई में नहीं, बल्कि भारत की एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने के हमारे सामूहिक प्रयासों में जीवित रहेगी। सरदार पटेल केवल रियासतों को जोड़ने वाले शिल्पकार नहीं थे, वे बिखरी हुई राष्ट्रीय चेतना को एक संकल्प में बदलने वाले युगपुरुष थे। उनकी जयंती पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि भारत की एकता को केवल इतिहास की उपलब्धि नहीं, वर्तमान का उत्तरदायित्व और भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी बनाएंगे। यही लौहपुरुष के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही राष्ट्रीय एकता दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

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