पाकिस्तान। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बंधुआ मजदूरी के खिलाफ बिगुल फूंकने वाली हिंदू महिला वीरो कोलही (50) ने 11 मई को हो रहे प्रांतीय चुनाव में ताल ठोक संघर्ष की नई इबारत लिखने की तैयारी कर ली है। आतंकवाद और अल्पसंख्यकों पर जुल्म के लिए बदनाम मुल्क में जमींदारों के चंगुल में फंसे हजारों मजदूर वीरो की दिलेरी के कारण ही आज आजाद हैं।
संपत्ति के नाम पर वीरो ने दो चारपाई, पांच गद्दे, कुछ बर्तन और बैंक में 2800 रुपये होने की जानकारी दी है। कम उम्र में ब्याह दी गई वीरो पति का कर्ज चुकाने के लिए मजदूरी करने को मजबूर हुई। लेकिन, आजादी की ललक में वह बीती सदी के आखिरी दशक में वह जमींदार के चंगुल से निकल भागी। उसे डर था कि उसकी बेटी भी जमींदारों की हवस का शिकार न बन जाए। उसका आज 20 नाती-पोतों से हंसता-खेलता परिवार है। अपनी आजादी के बाद वीरो ने बेईमान नौकरशाहों की मदद से जुल्म ढा रहे जमींदारों के खिलाफ प्रशासन से लेकर अदालतों तक मोर्चा संभाला।
उसने एक बार भूख हड़ताल कर 40 से ज्यादा साथियों को आजादी दिलाई। आज सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर के पास बंधुआ मजूदरों के भंवर से निकले लोगों की अपनी एक बस्ती है, आजाद नगर। इनमें से ज्यादातर हिंदू हैं।
छोटे से झोपड़े में रह रही वीरो का कहना है कि जमींदार हमारा खून चूस रहे हैं। उसकी सेवाएं ले रहे एक स्थानीय संगठन ने पिछले 12 साल में कर्ज तले दबे 26,000 मजदूरों को आजाद कराने का दावा किया है। धन-बल और पुरुषों के वर्चस्व वाली चुनावी व्यवस्था में खटारा कार से प्रचार करने उतरी वीरो की जीत की उम्मीद कम है, लेकिन उसे इसकी परवाह भी नहीं है। वीरो ने चुनाव कार्यालय खोलते हुए अल्टीमेटम दिया था कि पहले हम जमींदारों से कानूनों का पालन करने को कहेंगे, इन्कार करने पर अदालत में जाएंगे। जमींदारों की गुलामी से आखिरी मजदूर को मुक्त कराने तक यह जंग जारी रहेगी।