अच्छा होता कि दीक्षा समारोह पर जो करोड़ों रुपए खर्च हुआ है, उसे ओसवल समाज के युवाओं की पढ़ाई लिखाई पर खर्च किया जाता। डोसी को यह समझना चाहिए कि ओसवाल समाज का हर परिवार उनके जैसा धनाढ्य नहीं है। ऐसे अनेक परिवार मिल जाएंगे, जिनके बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक मदद की जरुरत है। अभिभावकों के पास पर्याप्त धनराशि नहीं होने की वजह से अनेक बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित भी हो रहे हैं। डोसी ने यह तो दिखा दिया कि वह अपना 1200 करोड़ रुपए का कारोबार छोड़कर संन्यासी बन गए हैं, लेकिन संन्यास का जो संदेश देना चाहिए वह शायद डोसी नहीं दे पाए, डोसी ने अपनी दीक्षा आचार्य गुणरत्न सुरीस्वरजी से ली है। डोसी ने जिस भव्यता के साथ दीक्षा समारोह आयोजित किया, उससे आचार्य गुणरत्न जी गर्व महसूस कर सकते हैं। अब आचार्य के संघ में ऐसा मुमुक्षु हैं जो 1200 करोड़ का कारोबार छोड़ कर आए हैं। लेकिन सवाल उठता है कि डोसी ने संन्यास से समाज को क्या नई दिशा मिली? क्या संन्यास ग्रहणकरने से पहले इतना भव्य आयोजन करना पड़ता है? यदि कोई साधारण ओसवाल आचार्य गुणरत्न से संन्यास की दीक्षा लेना चाहेगा तो उसे मिल जाएगी? असल में किसी एक धनाढ्य व्यक्ति के संन्यास लेने से सम्पूर्ण समाज पर असर नहीं पड़ता है। समाज पर तो तभी प्रभाव पड़ेगा, जब अधिकांश लोग अपने घर परिवार में भी साधारण जीवन व्यतीत करेंगे। सम्पूर्ण समाज की बात छोड़ दीजिए ओसवाल समाज में ही गरीबी-अमीरी की खाई बनी हुई है। यदि कोई व्यक्ति सांसारिक जीवन में भी मांस, शराब, तम्बाकू आदि का उपयोग नहीं करता है तो वह भी किसी संन्यासी से कम नहीं हैं। अच्छा हो कि आचार्य गुण्रत्न जैसे संत नशे की प्रवृति को रोकने का अभियान चलाए। आचार्य गुणरत्न ने भंवरलाल डोसी का नाम अब मुमुक्षु भव्य रत्न रख दिया है। भव्य रत्न संन्यास का जीवन कैसे व्यतीत करेंगे, यह वहीं बता सकते हैं। यानी मुमुक्षु बनने के बाद डोसी के नाम के साथ भव्यता तो जुड़ी हुई है।
(एस.पी. मित्तल)(spmittal.blogspot.in) M-09829071511

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