नई दिल्ली / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आशीर्वाद से भाजपा में शामिल होने वाली किरण बेदी को प्रदेश के नेताओं ने बेमन से ही सही, लेकिन हाथों हाथ लिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से नहीं होने व चुनावी बेला में भाजपा की सदस्य बनने से काडर में होने वाले असंतोष से बचने के लिए उनको सीधे तौर पर मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में तो पेश नहीं किया है। लेकिन साफ संकेत दिए हैं कि चुनाव मैदान में वह उनके ही नेतृत्व में उतरने जा रही है। 19 जनवरी को होने वाली केंद्रीय संसदीय बोर्ड की बैठक में उन्हें चुनावों से जुड़ी अहम जिम्मेदारी भी दी जा सकती है।
भाजपा के भीतर बेदी को लेकर काफी सक्रियता है। प्रदेश के अधिकांश बड़े नेता उनको इस तरह से लाने व भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने से सहमत नहीं है, लेकिन पार्टी आलाकमान से हुए फैसले के खिलाफ वे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। हालांकि इससे प्रदेश के कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर है। प्रदेश के नेताओं के आपसी झगडमें को रोकने में भी इससे मदद मिल सकती है, लेकिन भितरघात की आशंकाओं को लेकर पार्टी सचेत है। बेदी के आने से मायूस प्रदेश के नेताओं की नजरें संघ की तरफ लगी हैं जो बेदी के संघ पृष्ठभूमि से न होने के चलते कम से कम उनको मुख्यमंत्री बनने से रोक सकता है।
भितरघात रोकने सक्रिय रहेगा संघ
सूत्रों के अनुसार बेदी को स्थापित करने व प्रदेश के बड़े नेताओं की तरफ से किसी भी तरह के भितरघात को रोकने के लिए संघ की अहम भूमिका रहेगी। चुनावों के दौरान भाजपा संगठन के साथ काम कर रहे संघ के कार्यकर्ता हर विधानसभा क्षेत्र के हर बूथ पर सक्रिय रहेंगे। इस काम पर भाजपा के महामंत्री संगठन रामलाल खुद नजर रखेंगे। दरअसल बेदी के तेवर भाजपा के प्रमुख नेताओं को पच नहीं रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व काफी सतर्क है। हर विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी दिल्ली के बजाए बाहर से आए नेता को दी जा रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर कोई गड़बड़ी न हो।