रूठा मानसून,खरीफ की फसलों पर संकट के बादल

लखनऊ। एक बार फिर मानूसन दगा दे गया। मानसून को लेकर मौसम विभाग द्वारा की गई भविष्यवाणी इस बार भी कसौटी पर खरी नहीं उतरी। साल के शुरूआत से मौसम विभाग लगातार घोषणा कर रहा था कि अबकी से मानसून अच्छा रहेगा। साल का मध्य आने पर कहा जाने लगा कि अबकी से मानसून निर्धारित समय यानी 21 जून से करीब हफ्ते भर पहले दस्तक दे देगा। 13 जून से प्रदेश में जबर्दस्त मानसून की भविष्यवाणी की गई थी, लेकिन जेष्ठ बीत गया, आषाढ़ खत्म होने वाला है। 25 जनू से सावन मास लग जाएगा, लेकिन मानूसन तो दूर आसमान में बादल भी चहलकदमी करते नहीं दिखाई दे रहे हैं। शहर में जनता गर्मी से त्राहिमाम कर रही है। पंखे,कूलर सब बेकार साबित हो रहे हैं तो गांव में हालात और भी खराब हैं। मौसम की बेरूखी से किसान परेशान हैं। हों भी क्यों न, बारिश न होने से नहर तालाब सूखे पड़े हैं तो वहीं बिजली की बेतहाशा कटौती से भी किसान बेहाल हैं। बारिश न होने से खेतों में की गई बुआई भी सूखने लगी है। किसानों को सूखे का डर सता रहा है। धान खरीफ की प्रमुख फसल होती है। धान के पौधों की रोपाई का काम मानूसन आने से लगभग दो सप्ताह पूर्व सम्पन्न हो जाती है,लेकिन इस बार एक महीने से अधिक का समय हो चुका है,लेकिन मानूसन ने दस्तक नहीं दी है जिसकी वजह से हालात सूखे जैसे बनते जा रहे हैं। अब तो किसान कहने लगे हैं,‘ का वर्षा,जब वर्षा कृषि सुखानेे’।
गौरतलब हो, धान क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। देश में धान का वार्षिक उत्पादन 104.32 मिलियन टन तथा औसत उत्पादकता 2390 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर है। देश में उत्तर प्रदेश सहित पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिसा, असम, हरियाणा व मध्यप्रदेश प्रमुख धान उत्पादक राज्य हैं। इसकी खेती अधिकतर वर्षा आधारित दशा में होती है, जो धान के कुल क्षेत्रफल का 75 प्रतिशत है।
बहरहाल, आधा जुलाई बीत चुका है, अब तक काफी बारिश हो जाती थी,लेकिन अबकी बार एक दो दिन तेज और रिमझिम बारिश और बूंदाबांदी होकर ही रह गई है। ऐसे में नहर तालाब भी सूखे पड़े हैं तो वहीं जरूरत के हिसाब से बिजली न मिलने से किसानों की फसल मुरझा रही हैं। मौसम की दगाबाजी से किसान चिंतित है। किसानों को उम्मीद थी कि इस बार मानसून की शुरूआत से ही अच्छी बारिश होगी, जिस वजह से किसानों ने खाद, बीज आदि का इंतजाम कर खेतों की जुताई और बुबाई भी कर दी थी, लेकिन जुलाई का आधा माह से अधिक बीत चुका है और अब तक आधी बारिश भी नहीं हुई है। किसानों की बुआई पर पानी फिर गया है। किसान आसमान की ओर निहार कर थक चुका है, लेकिन बारिश नहीं हो रही है। खेतों में इस समय चरी, वन आदि की फसल प्रभावित हो रही है। बाजरा की बुआई भी सूखने लगी है। ऐसे में किसान बेहद चिंतित नजर आ रहे हैं। बारिश कम होने से फसलों की बुआई पर खराब असर पड़ रहा है, इन दिनों अधिकतम तापमान फसलों के लिहाज से 25 से 28 डिग्री होना चाहिए, तब तापमान 35 से 40 के बीच चल रहा है। ऐसे में किसानों को तगड़ा झटका लग सकता है। सूखे से त्राहिमाम कर रहे लोग अब बारिश के लिए टोने टोटकों का भी सहारा ले रहे हैं।
हालात यह हैं कि खेत में जहां नजर डालो वहा दरारें दिख रही है, पानी नहीं बरसने से फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। प्रदेश के क तमाम गांवों की कहानी एक जैसी है। नहर में पानी नहीं आने से किसानों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं, जिम्मेदार अधिकारियों से इसकी शिकायत कई बार की जा चुकी है,लेकिन किसी अधिकारी के कान पर जूं नहीं रेंगा है। ऐसा लगता है सरकार किसानों के हित में केवल कोरी बयानबाजी कर रही है। कुछ किसानों ने अपने निजी पंपसेट से धान में पानी दे रहे हैं।
बारिश नहीं होने से सुखाड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई है। जिससे धान की खेती पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। सबसे ज्यादा नुकसान छोटे किसानों को हो रहा है, जो संपन्न किसान है। वह पानी पटा कर धान के फसल को बचान में लग गए हैं। कई किसान फसल को भगवान के भरोसे छोड़े हुए हैं। पानी पड़ा तो ठीक नहीं तो भगवान ही मालिक है। बढे़ लागत पर उपजाए गए धान की फसल को बाजार में बेचने पर लागत दाम निकालना भी मुश्किल हो जाता है। इन्हीं सब कारणों से खेती करना घाटे का सौदा बन गया है। हालात यह है कि किसान बारिश के लिए आकाश को ताकते नजर आ रहे हैं। इस साल वर्षा पात लगभग शून्य है। कहा जाता है कि जिस वर्ष जितनी अच्छी बारिश उतनी ही अच्छी धान की फसल होती है। जाहिर सी बात है फसल अच्छी होगी तो उत्पादन भी अधिक होगा। अवर्षा से किसानों को अब चिंता सताने लगी है। जुलाई समाप्त हो गया है ऐसे में धान की फसल पर ग्रहण लगता दिख रहा है।

संजय सक्सेना,लखनऊ

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