*आवाजों का छायादार चेहरा*
*रात घर से निकलते हुए डर लगता है*
*चांद दीवार पर रखा कटा सर लगता है*
*अब्बास ताबिश का यह शे’ र हर उस समय के लिए माैजू बैठता है जब अंधेरे समूह चांद की चांदनी को डसने लगते हैं ।* *मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा जाने के रस्ते को बाधित करने वाली हर चाल सबके समझ में आ रही है। नटराजन का राज्यसभा में जाना महज एक कांग्रेसी की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि आत्ममुग्ध -प्रपंची समय में गांधीवादी मूल्यों को जीने वाली ,भारतीय शुचिता को सहेजने वाली, उस महिला का जाना था, जो कविताएं लिखती हैं, किताबें लिखती हैं,जिनके भीतर संवेदना का सोता बहता है।*
*मैं निजी रूप से मीनाक्षी नटराजन से कभी नहीं मिला लेकिन उनकी किताब “अपने अपने कुरुक्षेत्र” और मेरा उपन्यास “आवाजों के छायादार चेहरें” एक ही प्रकाशन समूह (सामयिक प्रकाशन) और एक ही प्रकाशन वर्ष(2023) में प्रकाशित हुआ था। दोनों किताबों साथ-साथ पढ़ी गई, साथ साथ समीक्षाएँ, चर्चायें हुई थी। इस तरह मीनाक्षी जी मेरी साहित्यक सहोदर जरूर बनी रही। उक्त दोनों किताबों के शीर्षक- संदर्भ को देखकर कहा जा सकता हुआ कि उनका ‘अपना कुरुक्षेत्र’ चाहे जो हो लेकिन वे संसद के शोर में “आवाजों का एक छायादार चेहरा” हो सकती थी। यद्यपि आज की राजनीति में साहित्य-स्वर का होना दुस्साहस का होना है।*
*आज जब संसद में भाषा, व्यहवार, विचार का एकदम से अकाल पड़ा हुआ है, वहां मीनाक्षी एक दीपक की तरह आश्वस्ति भर होती।शायद यह चुनौती भी होती कि चारो ओर शिक्षा और साहित्य को लताड़ने वालो के बीच अपने आप को कैसे सिद्ध कर पाती।*
इससे पहले कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती, डरे हुए नायकों ने उन्हें वहां पहुंचने से पहले ही रोक दिया।
मेरी एक कविता की कुछ पंक्तियां याद आती हैं
*आप महानायक है*
*आपकी असीम ताकत,* *अनुयायी और हथियार* *डरते हैं*
*उस कलम से*
*मुस्कुराते हुए*
*आपसे सवाल कर लेती है*
*जो तोप के आगे*
*फूल लेकर खड़ी हो जाती है*
*रास बिहारी गौड़*