महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर में डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में “अंबेडकर दृष्टि : समता से सामर्थ्य” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन
अगले वर्ष से विश्वविद्यालय में मनाया जाएगा भीम सप्ताह – कुलगुरु प्रो अग्रवाल ने की घोषणा
अजमेर, 15 अप्रैल। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर में आज डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में “अंबेडकर दृष्टि : समता से सामर्थ्य” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन विश्वविद्यालय के स्वराज सभागार में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में विधायक डॉ. लालाराम बैरवा उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विख्यात चिंतक एवं विचारक जसवंत खत्री ने अपने वक्तव्य मे कहा कि केवल समानता (Equality) से समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय नहीं पहुँचाया जा सकता, बल्कि समता (Equity) के माध्यम से ही वास्तविक सामाजिक न्याय संभव है। उदाहरण देते हुए बताया गया कि समान संसाधन सभी को देने के बावजूद, जब तक आवश्यकता के अनुरूप वितरण नहीं होगा, तब तक समाज के वंचित वर्ग मुख्यधारा में नहीं आ पाएंगे। उन्होने स्पष्ट किया कि “समता” ही वह माध्यम है जिससे समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सशक्त (सामर्थ्यवान) बनाया जा सकता है। इसके लिए संसाधनों का सम्यक एवं न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है, जो केवल कानूनों से नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और व्यापक दृष्टिकोण से संभव है। संगोष्ठी में “समरसता” को इस प्रक्रिया का आधार बताया गया। जसवंत खत्री ने कहा कि समरसता के बिना न तो समता स्थापित हो सकती है और न ही सामाजिक न्याय। समाज में आत्मीयता, ममता एवं त्याग का भाव विकसित करना आवश्यक है, जिससे संसाधनों का संतुलित उपयोग संभव हो सके। सामर्थ्य के मापदंडों पर चर्चा करते हुए उन्होने बताया कि समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए सामर्थ्य का अर्थ केवल आर्थिक सुदृढ़ता नहीं है, बल्कि उसे सम्मान, सहभागिता, अवसरों की समानता एवं सामाजिक सुरक्षा प्राप्त होना भी उतना ही आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का आकांक्षी होता है और उसे समाज एवं व्यवस्था में भागीदारी का अवसर मिलना चाहिए। उन्होने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान के मूल तत्व — स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, जिनमें बंधुत्व (Fraternity) सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही इन मूल्यों की स्थिरता सुनिश्चित करता है। इस अवसर पर डॉ. भीमराव अंबेडकर के शिक्षा संबंधी विचारों पर भी प्रकाश डालते हुए उन्होने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि उत्तम नागरिक का निर्माण करना है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ. लालाराम बैरवा विधायक, शाहपुरा-भीलवाड़ा एवं प्रबंध मंडल सदस्य ने अपने संबोधन में कहा कि एक जनप्रतिनिधि का कर्तव्य केवल राजनीति तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसे समाज के प्रत्येक वर्ग तक सकारात्मक विचार और संवेदनशील नेतृत्व पहुंचाना होता है। उन्होंने कहा कि वे एक शिक्षक के रूप में अपने जीवन की शुरुआत कर सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे हैं और अब राजनीतिक जीवन में जनसेवा का अवसर प्राप्त हुआ है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे अपने मार्गदर्शकों द्वारा बताए गए सिद्धांतों पर चलते हुए ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे। डॉ. बैरवा ने विश्वविद्यालय परिवार द्वारा दिए गए सम्मान के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनका विश्वविद्यालय में प्रथम आगमन है और उन्हें यहां आकर अत्यंत प्रसन्नता हुई।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर केवल इतिहास के महान व्यक्तित्व ही नहीं, बल्कि इतिहास के निर्माता थे। उनका जीवन संघर्ष, दूरदृष्टि और समाज के प्रति समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने सामाजिक समता, आर्थिक न्याय और राजनीतिक स्वतंत्रता के संतुलन पर आधारित राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना प्रस्तुत की। कुलगुरु ने कहा कि बाबा साहेब को “आधुनिक भारत के शिल्पी” के रूप में जाना जाता है, किंतु वे केवल आर्किटेक्ट ही नहीं, बल्कि राष्ट्र के निर्माता (बिल्डर) भी थे, जिन्होंने अपने विचारों को व्यवहार में उतारकर समाज में वास्तविक परिवर्तन लाने का कार्य किया। उन्होंने शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का आह्वान करते हुए कहा कि अनुसंधान का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका आधार सामाजिक उपयोगिता एवं नीति निर्माण होना चाहिए। बाबा साहेब के शोध कार्य, विशेषकर उनकी प्रसिद्ध कृति “The Problem of the Rupee”, आज भी भारत की आर्थिक नीतियों की आधारशिला है। प्रो. अग्रवाल ने बाबा साहेब के अध्ययन-अध्यापन के प्रति समर्पण का उल्लेख करते हुए बताया कि उनका विशाल निजी पुस्तकालय और ज्ञान के प्रति उनकी साधना प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि शोध कार्यों में सामाजिक प्रभाव और राष्ट्र निर्माण की दृष्टि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अपने उद्बोधन में उन्होंने बाबा साहेब को एक दूरदर्शी “ऋषि” की संज्ञा देते हुए कहा कि उनका जीवन करुणा, बंधुत्व और सत्याग्रही विचारों पर आधारित था। उन्होंने महिला सशक्तिकरण एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक योगदान दिया। कुलगुरु ने शोधार्थियों से आह्वान किया कि वे बाबा साहेब के जीवन एवं उनके समकालीन व्यक्तित्वों, विशेषकर रमाबाई अंबेडकर आदि पर भी गंभीर शोध करें, ताकि उनके विचारों को और अधिक व्यापक रूप से समाज तक पहुँचाया जा सके।
कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने घोषणा की कि आगामी वर्ष से विश्वविद्यालय में “भीम सप्ताह” का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को व्यापक रूप से विद्यार्थियों तक पहुँचाने हेतु यह पहल की जा रही है। इस दौरान व्याख्यान, संगोष्ठियां, प्रतियोगिताएं एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। कुलगुरु ने इसे समता, न्याय और राष्ट्र निर्माण के मूल्यों को सशक्त करने की दिशा में विश्वविद्यालय द्वारा लिया गया एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
शोधपीठ निदेशक प्रो शिव प्रसाद ने बताया कि डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय के तत्वाधान में 7 से 9 अप्रैल 2026 तक विभिन्न रचनात्मक एवं बौद्धिक प्रतियोगिताओं का सफल आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं का उद्देश्य विद्यार्थियों में समानता, न्याय एवं स्वतंत्रता के विचारों के प्रति जागरूकता विकसित करना रहा। 7 अप्रैल को “आधुनिक भारत के लिए बाबा साहब के विचार” विषय पर आयोजित प्रतियोगिता में चित्राशी जौनवाल प्रथम, भूमिका डाबोला द्वितीय एवं उदय पुरोहित तृतीय रहे।8 अप्रैल को “क्या आज का भारत डॉ. अंबेडकर का सपना पूरा कर पाया है?” विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता में अंशुल शर्मा प्रथम, प्रेमचंद मेघवंशी द्वितीय एवं प्रमोद चौहान तृतीय रहे। 9 अप्रैल को “समानता, न्याय व स्वतंत्रता – बाबा साहेब का सपना” विषय पर पोस्टर प्रतियोगिता में भारती पुरोहित (प्रथम), रिंकू कंवर राठौर (द्वितीय) एवं भूमिका डाबोला (तृतीय) विजेता रहे। कार्यक्रम में अतिथियों एवं कुलगुरु द्वारा विजेताओं को पुरस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन किया गया तथा आयोजन में सहयोग देने वाले सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अधिकारीगण, शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। अंत में कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया