लखनऊ। यह उम्मीद कतई बेमानी होगी कि 11 महीने जो सरकार का कार्यकाल है या बजट से बजट के बीच का जो आठ महीने का वक्त रहा है, उसमें किसानों की माली हालत रातों रात बदल सकती थी। लेकिन इस सच को भी नाकारा नहीं जा सकता कि बदलाव के लिए जो कदम इस दरम्यान उठाए जा सकते थे, वह नहीं उठाए गए। उसकी वजह कुछ भी हो सकती है। यह भी हो सकती है कि जिस तंत्र पर किसानों से जुड़ी योजनाओं को क्रियान्वित करने की जिम्मा हो, किसान उसकी प्राथमिकता में ही न हो। बड़े-बड़े मॉल में जाकर सब्जी से लेकर आटा-चावल-दाल खरीदने वाले अफसरों ने कभी किसानों की पांवों की बिवाई और उसके तन पर फटे कपड़े देखे ही न हों। उस किसान के कंधे पर बूढ़े मां-बाप की सेहत से लेकर जवान होती बेटी के हाथ पीले करने की जिम्मेदारी के अहसास महसूस करने की जरूरत ही न समझी हो।
शायद यही वजह रही कि कृषि व संबद्ध सेवाओं के लिए बजट में मुख्यमंत्री ने लगभग साढ़े पांच हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था की थी लेकिन अब तक यह रकम आधी भी खर्च नहीं हो पाई। जो खर्च भी हुआ, वह ज्यादातर तनख्वाह पर गया। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं में मिलने वाले धन का इस्तेमाल करने में कोताही बरतना भी कृषि क्षेत्र के विकास के लिए नुकसानदेह रहा। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत मिले करीब आठ करोड़ रुपये में से 40 फीसद ही खर्च हुआ। विकास कार्यो की वित्तीय स्वीकृति मिलने में देरी होने से बजटीय लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा।
प्रदेश में नई कृषि नीति लागू करने की घोषणा पर अमल नहीं हो सका जबकि मुलायम शासन काल में वर्ष 2005 की कृषि नीति को ही संशोधित किया जाना था। नई कृषि नीति में कांट्रेक्ट फार्मिग के मसले पर हिचकिचाहट बरकरार रही। दूसरी ओर किसानों की भूमि को जबरन अधिग्रहण से बचाने के लिए नई नीति बननी थी। मुख्यमंत्री ने अपने बजटीय भाषण में इसका आश्वासन दिया था लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया।
किसानों की आय बढ़ाने को मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट पर भी काम शुरू नहीं हो पाया। आलू उत्पादक किसानों को लाभ पहुंचाने को कन्नौज में आलू से वोदका बनाने का संयंत्र लगाने का प्लान निवेशकों द्वारा रूचि न दिखाने के कारण आगे नहीं बढ़ सका। कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना और भंडारण करने की दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। इसके अलावा दुग्ध संघों को पुनर्जीवित करने की कार्ययोजना का लाभ भी दुग्ध उत्पादक किसानों तक नहीं पहुंचा है। लखनऊ में पांच लाख लीटर दुग्ध प्रतिदिन हैंडलिंग क्षमता वाले डेरी प्लांट के लिए बजट में बीस करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई। इस दिशा में डेरी के शिलान्यास से आगे बात न बढ़ सकी तो अब निजी क्षेत्र का सहयोग लेने की कोशिशें हो रही हैं।
बंजर, बीहड़ और अनुपजाऊ जमीन को उपयोगी बनाकर भूमिहीनों में बांटने की योजना पहली समाजवादी सरकार में बनी थी। भूमि सेना गठित करके भूमिहीनों की मदद करना सपा प्रमुख मुलायम सिंह का सपना रहा है। बहुमत की सरकार बनने के बाद मुलायम का सपना साकार होने की उम्मीद थी लेकिन 47.83 करोड़ रुपये के बजट के बावजूद भूमि सेना अपने पैरों खड़ी नही हो सकी।
किसानों को कर्ज माफी के वादे को हकीकत में बदलने का इंतजार करते-करीब एक साल का वक्त गुजर गया। चुनावी घोषणापत्र के अनुरूप पिछले बजट भाषण में मुख्यमंत्री ने प्रदेश के ऐसे किसानों को, जिन्होंने अपनी कृषि भूमि को बंधक बनाकर प्रदेश के सहकारी बैंकों से खेती से जुड़े कार्यो के लिए पचास हजार रुपये तक ऋण लिया है और कर्ज अदा न कर पाने के कारण भूमि की नीलामी की स्थिति पैदा हो गई है, उन्हें राहत देने के लिए ऋण राहत योजना लागू करने की बात कही थी। बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई थी।
हालांकि इस बारे में शासनादेश जारी होने में ही छह माह से ज्यादा का समय लग गया। दिसंबर में शासनादेश के जरिए ऋण माफी की शर्ते तय कर दी गईं। इसके बाद अब उप्र सहकारी ग्राम विकास बैंक ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर पात्र लाभार्थियों की सूची तैयार कराने की कवायद में जुटा है। जिसका सत्यापन संबंधित जिलाधिकारी द्वारा गठित समिति करेगी। यानी कर्ज माफी के लिए किसानों को अभी और इंतजार करना पड़ेगा।
सरकारी नलकूपों व नहरों से किसानों को मुफ्त सिंचाई का वादा निभाने का शासनादेश जारी तो किया गया लेकिन उनकी दशा दुरुस्त करने पर ध्यान नहीं दिया जा सका। बजट में सिंचाई कार्यो के लिए साढ़े आठ हजार करोड़ का प्रावधान किया गया था। नलकूपों का रखरखाव व नहरों की सिल्ट सफाई कार्य भी पूरा नहीं हो सका। रबी फसलों में 30,650 किमी नहर सिल्ट सफाई लक्ष्य के सापेक्ष मात्र 8,347 किमी नहरें ही साफ हो सकीं। नलकूप दुरुस्त करने का अभियान भी सुस्त रहा। सात हजार नलकूप सरकारी आकंड़ों में आज भी बंद हैं। बुंदेलखंड की सूखा समस्या दूर करने को इजरायल मॉडल लागू किए जाने की योजना भी फाइलों से बाहर न निकल सकी।
वहीं, ग्रामीण विद्युत फीडर अलग करने की योजना भी परवान न चढ़ सकी जबकि बजट पेश करते समय सीएम ने पृथक विद्युत फीडर स्थापना को अलग राज्यांश की व्यवस्था का आश्वासन दिया था।
प्रदेश में कृषि की विकास दर बढ़ाना है तो हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब व बिहार जैसे राज्यों से सबक लेना होगा। सरकारी योजनाओं का लाभ गरीब किसानों तक पहुंचाने को पहले प्रशासनिक तंत्र दुरुस्त करना होगा। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने को ढांचागत बदलाव जरूरी है। उन्हें सब्सिडी का लाभ सीधे मिलना चाहिए। साथ ही बिचौलियों के हाथों किसानों की लूट भी बंद हो।
जानकारों का मानना :
राकेश टिकैत, प्रवक्ता, भारतीय किसान यूनियन
सरकार खेती को बढ़ावा देना चाहती है तो अन्य राज्यों की तरह कृषि ऋण पर ब्याज दर न्यूनतम करनी होगी। कर्ज माफी योजना का विस्तार करते हुए उसमें वाणिज्यिक बैंक भी शामिल हों। गुणवत्तापूर्ण व उन्नत बीज किसानों को समय से पर्याप्त मात्र में उपलब्ध हों। कृषि निर्यात को प्रोत्साहन एवं विपणन व्यवस्था मजबूत करने को निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। कृषि शिक्षा व शोध को प्रोत्साहित करने के लिए अतिरिक्त बजट और संसाधन मुहैया कराए जाएं। कृषि विकास की योजना क्षेत्रीय जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार हो।
डॉ. सुधीर पंवार , संयोजक, किसान जागृति मंच
किसानों की आय में वृद्धि के अवसर मुहैया कराए बिना कृषि विकास का सपना साकार नहीं होगा। खेती के साथ ही किसानों को कृषि आधारित उद्योगों में भी हिस्सेदार बनाना होगा। सरकारी योजनाओं में एकरूपता के साथ उनका किसानों तक पहुंचने का बंदोबस्त भी जरूरी है। लगातार छोटी होती जोत के कारण किसानों को पशुपालन, मत्सय पालन, डेयरी, खाद्य एवं प्रसंस्करण उद्योगों से जोड़ा जाए तभी कृषि विकास दर में पांच प्रतिशत का आंकड़ा हासिल किया जा सकेगा। नवीनतम शोध का लाभ किसानों तक न पहुंचना भी बड़ी समस्या है।
डॉ. आरआर शर्मा, सेवानिवृत्त उप निदेशक, एएचवीएसई
पिछले साल विधानसभा चुनाव के मौके पर समाजवादी पार्टी की सभाओं में अगर युवाओं के बाद सबसे ज्यादा किसी की भीड़ जुटती थी तो वह होते थे किसान। पार्टी ने भरोसा दिलाया था कि उन्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं, उनके हालात बदलने को क्या कुछ करना है, वह हमें पता है। किसानों को यकीन भी था क्योंकि ‘नेताजी’ को यूं ही धरतीपुत्र नहीं कहा जाता। खेतों की पगडंडियों से गुजर कर ही वह सत्ता की इस ऊंचाई तक पहुंचे हैं। अब भी जब वह सैफई में होते हैं तो अपने खेतों में जाना और फसलों का हालचाल लेना नहीं भूलते। उनके बेटे ने अपने पहले बजट में किसानों की बेहतरी के लिए जो भी योजनाएं मुमकिन थीं, उन्हें शामिल किया। आस बंधी थी किसानों के हालात में बदलाव की। दूसरा बजट आने तक कितना बदलाव आया, यह बता रहे हैं अवनीश त्यागी
यह था बजट
कृषि एवं संबद्ध सेवाओं के लिए 5,432.37 करोड़
सिंचाई कार्यो के लिए 8,525.70 करोड़
किसानों की ऋण राहत योजना 500 करोड़
गन्ना किसानों के अवशेष भुगतान के लिए 400 करोड़
भूमि सेना योजना चलाने के लिए 47.83 करोड़
