नई दिल्ली। यूपीए सरकार चाहे विकास के कितने भी दावे कर ले उसके आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। सरकार ने लगभग 20 महीने तक चले जद्दोजहद के बाद आखिरकार मान लिया है कि यूपीए-1 सरकार के 2004-05 से लेकर 2009-10 के कार्यकाल में देश में बेरोजगारी बढ़ी।
यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में स्वरोजगार करने वालों कुल श्रमिकों की संख्या भी 56.4 फीसद से गिरकर 50.7 फीसद रह गई। वास्तविक संख्या के तौर पर देखा जाए तो यह लगभग 25 करोड़ 80 लाख से घटकर 23 करोड़ 20 लाख रह गया। हालांकि इस समय वेतनभोगी कर्मियों की संख्या 6 करोड़ 90 लाख से बढ़कर 7 करोड़ 50 लाख अवश्य हो गई। इसी तरह आकस्मिक श्रेणी के श्रमिकों की संख्या में 12 करोड़ 90 लाख से बढ़कर 15 करोड़ 10 लाख तक पहुंच गई। कुल मिलाकर श्रमिकों की संख्या 45 करोड़ 70 लाख से बढ़कर 45 करोड़ 90 लाख रही, जो महज 0.3 फीसद की वृद्धि दर्शाता है।
योजना मंत्रालय ने कार्यबल प्रबंधन में सीमित लचीलापन, श्रम नियमों के पालन की उच्च लागत, खराब कौशल विकास और बड़े असंगठित क्षेत्र को बेरोजगारी में वृद्धि के कारणों के रूप में चिह्नित किया है।
संसद की वित्तीय स्थायी समिति के इस प्रश्न के जवाब में कि भारत में रोजगार के ज्यादा अवसर क्यों नहीं बढ़ रहे हैं, मंत्रालय का कहना है कि वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या बढ़ने के कारण स्वरोजगारों की संख्या में कमी आई है।
दिलचस्प यह है कि मंत्रालय ने जून 2011 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेश्रण संगठन (एनएसएसओ) के 66वें दौर में यही डाटा सरकार को भेजा था जिसे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अशुद्ध करार देते हुए खारिज कर दिया था।
सरकार द्वारा इस डाटा को स्वीकार करना सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए शर्मिदगी भरा तो है ही साथ ही यह मनमोहन सरकार की ‘समावेशी विकास’ के दावे की भी पोल खोलता है।
गौरतलब है कि पहले सरकारी दबाव में एनएसएसओ ने रोजगार आंकड़ों को प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। इसके पीछे महिलाओं का रोजगार के लिए घर से बाहर निकलने का हवाला दिया गया था।
यद्यपि, योजना मंत्रालय ने वित्त समिति से कहा है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में भारत ने औसत 7.9 फीसद की दर से विकास किया है। लेकिन यह आंकड़ा रोजगार के अवसर बढ़ाने में सहायक नहीं हो सका।