देहरादून। उत्ताराखंड में प्राकृतिक आपदा के नौ दिन बाद भी मृतक संख्या पर असमंजस की स्थिति है। आपदा के केंद्र रहे केदारनाथ की नब्बे धर्मशालाओं और आश्रमों में घटना के वक्त करीब 15 हजार लोग थे। पाच हजार यात्री आसपास के इलाकों में थे। केदार घाटी के छोटे-छोटे करीब सौ गावों में भी हजारों लोग थे। देहरादून में सैकड़ों लोग परिजनों की तस्वीर लिए राहत शिविरों के चक्कर लगा रहे हैं। सरकार भी मान रही है कि 7,500 लोग लापता हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तीन दिन से मृतक संख्या एक हजार तक पहुंचने के बयान पर बने हुए हैं।
मृतकों का सरकारी आकड़ा भी 822 तक ही पहुंच पाया है। केदारनाथ में अभी तक तीन सौ से ज्यादा शव एकत्रित किए जा चुके हैं, लेकिन डीएनए नमूना न लिए जाने के कारण उनका अंतिम संस्कार लंबित है।
बर्बादी के केंद्र रहे केदारनाथ में सबसे ज्यादा जनहानि हुई है। आपदा के समय वहा 15 हजार से ज्यादा लोग थे। कपाट खुलने के बाद गर्मी की छुट्टी के दिनों में श्रद्धालुओं, साधु-संतों और कामकाजी लोगों की इतनी संख्या होना सामान्य बात थी। इसके अतिरिक्त चार धाम यात्र में शामिल कई हजार लोग मार्ग में थे।
शनिवार- रविवार की रात में हालात से अनभिा बाहरी लोग तेज बारिश के समय भी अपने ठिकानों में बने रहे। पत्थर-मलबे के साथ आए पानी के सैलाब ने कहर ढाना शुरू किया, तब भगदड़ मची। धर्मशालाएं, गेस्ट हाउस और आश्रम के भवन ढहे-बहे तो उनमें टिके तमाम लोग चपेट में आ गए। जान बचाने के लिए भागे तमाम लोगों की भी जान गई। भूख-प्यास में भी बहुतों ने दम तोड़ा।
केदारनाथ मंदिर के एक पुजारी के अनुसार, मुख्य आराधना स्थल में पानी भरने लगा तो भगवान का नाम लेना शुरू किया, तभी पानी के जोर से दसियों साल से बंद एक द्वार टूट गया और पानी बाहर जाने लगा। केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुंड त्रिजुगीनाराण, लमगौड़ी, ल्वारा, डुंगर, सेमला से लापता लोगों का आकड़ा भी दो हजार से अधिक है। ऊखीमठ, अगस्त्यमुनि ब्लॉक, चमोली, टिहरी, पौड़ी से यहा आने वाले तमाम व्यापारी भी गुम हैं। रुद्रप्रयाग के सत्तार से अधिक गावों के भी दो हजार लोग लापता हैं।