राजस्थान में बहुत जोर आएगा मोदी व शाह को

-तेजवानी गिरधर-
राजस्थान अब चुनाव के मुहाने पर खड़ा है। दोनों दलों में प्रत्याशियों के चयन की कवायद भी कमोबेश आरंभ हो गई है। माना यही जा रहा है कि राज्य में हर पांच साल में सत्ता बदलने का ट्रेंड ही कायम रहेगा। ऐसे में जहां कांग्रेस उत्साहित है तो वहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को यही यकीन है कि वे ट्रेंड को बदल कर दुबारा सत्ता पर काबिज हो जाएंगी। अब तक जो सर्वे हुए हैं, उससे तो यही लगता है कि भाजपा का फिर सत्ता में आना कठिन है। इसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चिंतित हैं, क्यों कि अगर यहां भाजपा सत्ता से बेदखल हुई तो उसका असर आगामी लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। मोदी-शाह यही चाहते थे कि एंटी इन्कंबेंसी से बचने के लिए वसुंधरा राजे को साइड लाइन किया जाए, मगर बहुत प्रयासों के बाद भी वे ऐसा नहीं कर पाए। न केवल वसुंधरा राजे की सहमति से ही मदनलाल सेनी को प्रदेश अध्यक्ष घोषित करना पड़ा, अपितु यह भी ऐलान करना पड़ा कि आगामी चुनाव वसुंधरा के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। उसके बाद आई ग्राउंड रिपोर्ट में यह तथ्य उभर कर आया है कि भाजपा का ग्राफ काफी नीचे गिर रहा है। उसे ऊंचा करने के लिए खुद मोदी व शाह को बहुत मशक्कत करनी होगी।

तेजवानी गिरधर
ज्ञातव्य है कि एक बड़े सर्वे का निष्कर्ष था कि कांग्रेस को 143 और भाजपा को मात्र 57 सीटें मिल पाएंगी। सट्टा बाजार भी कांग्रेस को लगभग 140-150 और भाजपा को मात्र 50-60 सीटें दे रहा है। धरातल कर सच भी ये है कि लोकसभा व विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की करारी हार हुई। इससे वसुंधरा सरकार की चूलें हिल गईं। अगर उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में भी बड़ी हार नहीं हुई होती, तो राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन तय था। राजस्थान के नए मुख्यमंत्री के नाम भी बाजार में आ गए थे, लेकिन उत्तर प्रदेश की हार वसुंधरा के लिए अभयदान साबित हुई। उस हार के आगे राजस्थान की अभूतपूर्व हार को, भाजपा आलाकमान को नजरअंदाज करना पड़ा और वसुंधरा राजे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी।
असल में भाजपा का ग्राफ गिरने के कई कारण हैं। बड़ी वजह तो ये है कि जो सपने दिखा कर वसुंधरा सत्ता में आई, वे धरातल पर नहीं उतर पाए। इसके अतिरिक्त नोट बंदी व जीएसटी ने भी भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया है। दो बड़े मामलों में तो वसुंधरा सरकार को यूटर्न लेना पड़ा। प्रेस के खिलाफ वसुंधरा राजे एक साल पहले काला कानून लाई थीं, तब पत्रकारों ने उस काले कानून के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया था। राजस्थान पत्रिका ने तो सरकार की खबरों का बायकाट किया। आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा तथा कानून वापस लेना पड़ा। दूसरे मामला था बाबा रामदेव का। उन्हें करोली में जमीन देने का फैसला इस कारण बदलना पड़ा क्योंकि कोर्ट ने साफ कर दिया कि मंदिर माफी की जमीन नहीं दी जा सकती।
वसुंधरा राजे पर सीधे हमले करने वाले वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी ने सबसे ज्यादा मुसीबत खड़ी की। वे विधानसभा के अंदर व बाहर लगातार वसुंधरा को घेरते रहे। मगर भाजपा हाईकमान की हिम्मत ही नहीं हुई कि उन पर कार्यवाही करे। आखिरकार तिवाड़ी ने खुद ही पार्टी छोड़ी और नई पार्टी बना कर सभी दो सौ सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। बात अगर गौरव यात्रा की करें तो बेशक इसके जरिए वसुंधरा ने हालात पर काबू करने की भरसक कोशिश की है, मगर यह यात्रा भी कुछ विवादों में आ गई। यात्रा में किए जा रहे सरकारी खर्च को लेकर हाईकोर्ट के दखल से सरकार की किरकिरी हुई।
हालांकि कुछ लोगों का आकलन है कि जिस चुनावी सर्वे में भाजपा की हालत पतली बताई गई है, वह कुछ पुराना हो चुका है। तब तक न तो मोदी की रैली हुई थी और न ही शाह के दौरे आरंभ हुए थे। वसुंधरा की गौरव यात्रा भी शुरू नहीं हुई थी। अब वह स्थिति नहीं रही होगी। जरूर भाजपा का जनाधार कुछ संभला होगा। लेकिन अब भी भाजपा सरकार दुबारा बनेगी, इसमें संशय है। इतना तो पक्का है कि स्थितियां उसके अनुकूल नहीं हैं। उन्हें ठीक करने के लिए मोदी-शाह को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी।
चुनाव भले ही वसुंधरा के नेतृत्व में लड़ा जाए, मगर बड़े पैमाने पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का कड़ा निर्णय लेना पड़ेगा। कुछ मंत्री भी चपेट में आ सकते हैं। कुल मिला कर मोदी व शाह को चुनावी रणनीति में बड़ा फेरबदल करना होगा। अकेले वसुंधरा के दम पर चुनाव जीतना कत्तई नामुमकिन लग रहा है, इस कारण दोनों स्वयं भी धरातल पर आ कर ज्यादा से ज्यादा जोर लगाना होगा। संभव है संघ के सहयोग से तिवाड़ी को कुछ सीटें दे कर राजी करने की कोशिश की जाए। वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर की एंट्री हो सकती है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, भाजपा हाईकमान अपने पत्ते खोलेगी। वे क्या होंगे, इसका अनुमान लगाना कठिन है।

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